हमारा स्मारक : एक परिचय

श्री टोडरमल जैन सिद्धांत महाविद्यालय जैन धर्म के महान पंडित टोडरमल जी की स्मृति में संचालित एक प्रसिद्द जैन महाविद्यालय है। जिसकी स्थापना वर्ष-१९७७ में गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की प्रेरणा और सेठ पूरनचंदजी के अथक प्रयासों से राजस्थान की राजधानी एवं टोडरमल जी की कर्मस्थली जयपुर में हुई थी। अब तक यहाँ से 36 बैच (लगभग 850 विद्यार्थी) अध्ययन करके निकल चुके हैं। यहाँ जैनदर्शन के अध्यापन के साथ-साथ स्नातक पर्यंत लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था है। आज हमारा ये विद्यालय देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। हमारे स्मारक के विद्यार्थी आज बड़े-बड़े शासकीय एवं गैर-शासकीय पदों पर विराजमान हैं...और वहां रहकर भी तत्वप्रचार के कार्य में निरंतर संलग्न हैं। विशेष जानकारी के लिए एक बार अवश्य टोडरमल स्मारक का दौरा करें। हमारा पता- पंडित टोडरमल स्मारक भवन, a-4 बापूनगर, जयपुर (राज.) 302015

Thursday, April 20, 2017

‘कहान’ हृदयंगत होने के मायने



आडंबरों, पूर्वाग्रहों और समस्त पक्ष का व्यामोह त्याग पक्षातिक्रांत को अपना साध्य बना, जिस गुरु ने बीसवीं सदी की लगभग अर्ध शताब्दी में भारत भूमि को अध्यात्म की बारिश से सराबोर किया है उसकी एक और जन्म जयंती हम मना रहे हैं। कहान गुरु। एक ऐसा नाम जिनकी तुलना देश-दुनिया के उन दूसरे महापुरुषों से नहीं की जा सकती जो सेवा और समर्पण की कुछ अलग अर्थों में मिसाल पेश करते हैं...क्योंकि उन अधिकतम प्रयासों में अपनी तरह की कुछ अलग-अलग कामनाएं भी होती हैं लेकिन निरवाञ्छक होकर प्रथम तो आत्मांदोलन के मार्ग पर बढ़ना पश्चात् उस आत्मांदोलन से समाज में एक नया आंदोलन खड़ा कर देना बहुत अलग बात है।

      हम श्रेष्ठ, हमारा धर्म श्रेष्ठ, हमारा विचार, हमारी परंपराएं, हमारी पद्धत्ति, हमारी मान्यताएं श्रेष्ठ...ऐसा मानने वाले प्रायः समाज के हर वर्ग का इंसान होता है ऐसे में लगभग आधे जीवन तक स्वीकृत और नियति से सहज प्राप्त अपनी परंपराओं, अपने आग्रह और अमने मत को छोड़कर पारमार्थिक सत्य की ओर बढ़ना हर किसी के वश की बात नहीं है। लेकिन कहान गुरु ने ये किया और स्वविवेक एवं स्वपरीक्षण से न सिर्फ स्वयं परिवर्तित हुए किंतु दूर दूर तक लोगों को आत्मपरीक्षण तथा सच्चे धर्म की खोज के लिये प्रेरित किया। जो सिलसिला आज भी अनवरत जारी है और हम कह सकते हैं कि कहान गुरु हमारे बीच में न होकर भी हमारे बीच में बरकरार हैं। अपने मताग्रहों को छोड़कर पारमार्थिक सत्य की ओर बढ़ने वाले आज भी देखे जा सकते हैं और उन सबके प्रेरणास्त्रोत कम से कम वर्तमान परिवेश में तो कहान गुरु ही हैं। कोई माने य न माने किंतु जीवन का सबसे जटिल कार्य होता है अपने मताग्रह और पक्ष को छोड़ देना और जिसमें अपने पक्ष को छोड़ने की सामर्थ्य है वही वास्तव में सत्य के करीब पहुंच सकता है। निष्पक्ष होने की बात करना बहुत सरल है लेकिन निष्पक्ष होना बहुत कठिन। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि इस निष्पक्षता में सत्य और न्याय का पक्ष अंतर्गर्भित रहना चाहिये जो कहान गुरु के समूचे जीवन में बखूबी देखा जा सकता है।

      गुरुदेव श्री का उद्घाटित मार्ग आज के दौर में कहानपंथ के नाम से प्रचारित किया जाता है किंतु ये समझना बहुत जरुरी है कि कहान पंथ के जर्रे-जर्रे में अनादि से चले आ रहे वीतराग पंथ की परंपरा का ही निर्वहन है। कहान गुरु किसी पंथ के सृजक नहीं हैं वे मात्र उस अनादि की परंपरा वाले, मुक्ति के एकमात्र पंथ के उद्घाटक हैं। जो काल दोष से या किसी और वजह से रुढ़ियों, आडंबरों, क्रियाकाण्डों और अन्य दुराग्रहों में कहीं दब गया था। गुरुदेव श्री ने मिथ्या मान्यताओं के उन्हीं कंटकों को निष्कंटक पथ से दूर करने का कार्य किया और शुद्ध आत्मबोध के लिये अरहंतों का मार्ग जन-जन के सामने प्रगट किया। गुरुदेव स्वयं कहते थे अनंत ज्ञानियों का एक मत और एक अज्ञानी के अनंत मत। वास्तव में गुरुदेव भी उन अनंत ज्ञानियों के सुर में सुर मिलाने वाले ही थे किसी नवीन पंथ की स्थापना का तो सवाल ही खड़ा नहीं होता।

      ये समझना होगा कि मुक्तिमार्ग, ज्ञान की दिशा कभी भी लोकतांत्रिक विचार से प्रशस्त नहीं होती। ये न तो भीड़ का पंथ है और न ही भीड़ का विचार। भीड़ हमेशा एक भ्रम पैदा करती है और सारा जमाना उसी भीड़ के पंथ पर आंखे मूंदे चला जा रहा है, क्योंकि उस मार्ग पर चलना सरल है जिस पर पहले से ही अनेकों लोग आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन सच्चे सुख और मुक्ति का मार्ग नितांत अकेले ही तय करना होता है। गुरुदेव श्री भी अकेले ही चले थे लेकिन गुरुदेव की आराधना में इतना बल था कि उनका जीवन सहज ही एक अलौकिक प्रभावना की वजह बन गया। वास्तव में गुरु देव का मुमुक्षु जनों के लिये इतना ही अवलंबन था कि उन्होंने निरावलंबी स्वरूप का भान जनसमूह को करा दिया।

      ऐसे महान् दिग्दर्शक की महिमा एवं बहुमान आना लाजमी है लेकिन इस बीच हमें यह भी समझना आवश्यक है कि कहीं महिमा का अतिरेक हमें एक नये पक्ष का ग्राही तो नहीं बना रहा। जैसे सच्चे जिनेन्द्र भक्त होने का मतलब अपने जिनस्वरूप को देखना ही है ऐसे ही सच्चे गुरुभक्त के लिये भी आत्मोपलब्धि ही एकमात्र ध्येय है उस ध्येय के बीच मार्ग को उद्घाटित करने वाले गुरु, शास्त्रादि की यथायोग्य महिमा और बहुमान भी आता है पर उस बहुमान में हमारा ध्येय विस्मृत न हो यह ध्यान रखना आवश्यक है। इसके साथ ही भक्ति का अनुराग कई बार गुणों से ज्यादा व्यक्ति को प्रधान बना देता है जो कि जिनशासन में कहीं स्वीकृत नहीं है ऐसे ही हमारी भक्ति भी कहान गुरु के नाम के आगे कहीं उस अनादि-निधन मार्ग को धुंधला न कर दे, यह ध्यान हमेशा रहना चाहिये।

      यकीनन गुरुदेव श्री ने परमार्थ पर जोर दिया था लेकिन उनके जीवन में व्यवहार और चरणानुयोग की सुंदर झांकी देखी जा सकती थी। आज कई बार हम निश्चय को समझे बगैर, चरणानुयोग की इस तरह अवहेलना कर बैठते हैं कि वो पूरे मार्ग पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर देता हैं। द्रव्यानुसारी चरणं, चरणानुसारी द्रव्यं की उक्ति को भुलाकर, हम किसी एक के हठाग्रही बनेंगे तो वो तो मुक्ति का मार्ग नहीं ही हो सकता। हमेशा निश्चय को प्रधान रखना जरुरी है लेकिन चारित्र के प्रति उपेक्षा होना ठीक नहीं है।

      गुरुदेव श्री का आभामंडल तभी वास्तव में हमारे लिये प्रकाशपुंज का कारण बन सकता है जब हम अपने स्व-पर प्रकाशत्व स्वरूप की पहचान करें। अनादि की भटकन पर पूर्णविराम लगाने के लिये अग्रसर हों और मध्यांतर के पड़ावों से ही संतुष्ट होना छोड़ें। गुरुदेव हममें से कई के समकालीन नहीं थे लेकिन उन्होंने वो मार्ग हमारे सामने पुनः प्रस्तुत कर दिया जिससे हम यथाशीघ्र अनंत सिद्धों के समकालीन हो सकें।

सिद्धत्व का यही भान कर, पर्याय में भी उसी सिद्धत्व को प्रगटावें...गुरुदेव श्री की तो वास्तव में एक यही शिक्षा थी बाकि सब तो एक इसी का विस्तार मात्र था और वो विस्तार हमें संसार का संक्षेपण करने के लिये इस काल में महान् पुण्योदय से प्राप्त हुआ था। गुरुदेव श्री के उद्घाटित मार्ग को अपनाकर, हम स्वरूप की सीमा में ही ठहर असीम ज्ञान और आनंद के दरिया में डुबकी लगाये इस भावना के साथ गुरुदेव श्री की इस जन्मजयंती पर उनके चरणों में कोटिशः वंदन अर्पित करता हूँ।

प्रस्तुति-:
अंकुर शास्त्री
आलेख संपादक
दूरदर्शन, भोपाल

जैनदर्शन की संचार दृष्टि

जैनदर्शन की संचार दृष्टि
(समयसार गाथा 5 की टीका के विशेष संदर्भ में)


      संचार मानव की मूलभूत आवश्यकता है। कहते हैं इस चराचर जगत में प्रकृति का कण-कण, प्रत्येक प्राणी परस्पर संचार या संप्रेषण करता है। संचार जीवंत होने का प्रमाण है। बिना संचार के जीवन की कल्पना ही संभव नहीं है। वैज्ञानिक मान्यता है कि हमारे शरीर में पाई जाने वाली लाखों को कोशिकाएं परस्पर एक दूसरे संचार कर रही हैं जिस दिन यह संचार बंद हो जाता है उसी दिन व्यक्ति मृत घोषित कर दिया जाता है। तो इस तरह हम देखते हैं कि संचार प्राणी की अहम् आवश्यक्ता होने के साथ साथ जीवित होने का प्रमाण भी है।

      ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि विश्व में जीवन के पर्याय संचार को संकुचित अर्थों में नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि इसे व्यापक संदर्भों और विस्तृत दृष्टिकोण के साथ समझा जाना चाहिये। संचार विशेषज्ञ मानते भी है कि संचार से आशय महज इसके माध्यमों; जैसे- टीवी, अखबार, भाषा, टेलीफोन, रेडियो, इंटरनेट जितना नहीं है बल्कि संचार से आशय उस व्यापक क्षेत्र से है जो इन माध्यमों का भी आधार बनता है। इस परिभाषा से पता लगता है कि संचार विशेषज्ञों ने माध्यमों से ज्यादा विचार के उस विस्तृत और व्यापक क्षेत्र को संचार की धुरी माना है जो प्राणीमात्र के अवचेतन में गहरे तक पैठे हुए हैं। ज्ञान ही संचार का मूल आधार है।

      जैन आचार्य अमृतचंद्र ने ग्रंथ समयसार की टीका में इसे कुछ इस तरह से अभिव्यक्त किया है-

आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं, ज्ञानादन्यत करोति किम्।
परभावस्य कर्तात्मा, मोहो$यं व्यवहारिनाम्।।
      
अर्थात्- निश्चय से आत्मा ज्ञान स्वरूप है ज्ञान आत्मस्वरूप है। आत्मा ज्ञान के अतिरिक्त और करता ही क्या है? जो आत्मा को परभावों का कर्ता कहा जाता है वो व्यवहारनय का कथन है।

      इस तरह ज्ञान एवं विचार के व्यापक जगत को ही जीव की मुख्य धुरी माना है और संचार इस ज्ञान की ही एक अवस्था अथवा पर्याय है जो कतई जीव के कार्य से भिन्न नहीं है। लेकिन समस्या यह है कि दुनिया में संवाद को ही संचार मान लिया जाता है किंतु ऐसा एकदम नहीं है।

      संचार शास्त्रीयों ने संप्रेषण दो प्रकार का बताया है अशाब्दिक संचार और शाब्दिक संचार। इससे पता चलता है कि जो ध्वनि और शब्दों आदि के माध्यम से मुख से बाहर आता है वह तो संचार है ही किंतु जो मुखर नहीं होता और विचार या भावनाएं बनकर हमारे मन-मस्तिष्क में उमड़ता घुमड़ता रहता है वह भी संचार ही है। कहा जाता है कि अशाब्दिक संचार का दायरा बहुत बड़ा है जबकि शाब्दिक संचार बहुत सीमित और कम प्रभावी है।

      संचार क्रिया में प्रतिभागिता के आधार पर भी इसके चार भेद किये गये हैं-
1.       अन्तःवैयक्तिक संचार या स्वसंचार (intrapersonal or self-communication)
2.       अन्तरवैयक्तिक संचार (Interpersonal Communication)
3.       समूह संचार (Group Communication)
4.       जनसंचार (Mass Communication)

                इनमें स्वसंचार को ही समस्त संचारों का जनक कहा जाता है और सारे संचार स्वसंचार पर आकर ही संपन्न हो जाते हैं। क्योंकि दो व्यक्तियों के बीच संवाद हो, समूह में संवाद या चर्चा हो अथवा बिखरे हुये जनसमूह से चर्चा हो सभी में प्रथमतः स्वसंचारित होना जरुरी है और अंततः सामने वाले श्रोता-पाठक-दर्शक को भी स्वसंचारित करना जरुरी है।
      इसका क्रमिक मॉडल कुछ इस तरह बनता है-

संचारक/वक्ता -> संदेश/वक्तव्य ->माध्यम ->श्रोता/ग्रहीता -> प्रभाव/प्रतिपुष्टि

      इसमें हम देखते हैं कि अंतिम गंतव्य तक पहुंचते तक संचार क्रिया पुनः स्वसंचार का रूप ले लेती है और यह स्वसंचार के लिये जरुरी है स्वयं का अध्ययन, ध्यान, धारणा, चिंतन, मनन इत्यादि। तथा स्वसंचार की अधिकांश क्रिया अशाब्दिक ही होती है। इससे एक बात समझ लेना चाहिये कि सिर्फ शब्द, संवाद, चर्चा-वार्ता इत्यादि ही संचार नहीं है बल्कि संचार वह क्रिया है जो कि तब तक है जब तक की जीव/प्राणी की सत्ता है। एक और महत्वपूर्ण बात इस प्रकरण के संबंध में कह देना जरुरी है कि दुनिया में समस्त विचार, मान्यता या धर्म का जन्म स्वसंचार (Self-Communication)होता है और उनका प्रचार जनसंचार (Mass-Communication)से होता है। जैसे- भगवान महावीर ने 12 वर्षों तक तपश्चरण कर स्वानुभूति, स्वरूप में स्थिरता प्राप्त की जो कि स्वसंचार का उदाहरण है पश्चात केवलज्ञान होने पर समवशरण की रचना हुई जिसमें खिरी हुई दिव्यध्वनि से धर्म तीर्थ का प्रवर्तन हुआ जो कि जनसंचार का उदाहरण है। आराधना करना स्वसंचार है और प्रभावना होना जनसंचार है। वास्तव में आराधना पूर्वक ही प्रभावना हो सकती है।

      संक्षेप में इस संचार के आंतरिक स्वरूप पर चर्चा करने के बाद हम अब इसके प्रभावी बाहरी स्वरूप पर चर्चा करते हैं और जैनदर्शन, जैनआचार्यों की संचार दृष्टि को समझने की कोशिश करते हैं। जैसा कि संचार के बाहरी स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहा जाता है कि विचारों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को संचार कहते हैं। तो किस तरह से इन विचारों का आदान-प्रदान प्रभावी ढंग से किया जा सकता है इस पर जैन दर्शन, जैन न्याय में क्या शैली अपनाई गई है, किस तरह की विवेचनात्मक दृष्टि जैनाचार्यों की दिखती है इस पर हम विचार करते हैं क्योंकि यदि प्रभावी एवं तार्किक ढंग से अपनी बात आगे न बढ़ाई जाये तो धर्मतीर्थ की परंपरा को आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है।

      इस संबंध में आचार्य कुंदकुंद के समयसार की पांचवी गाथा दृष्टव्य है जो कि प्रभावना के कार्य में या कहें निज अनुभूति के संप्रेषण में अपनी संपूर्ण ताकत लगाते हैं और अपने समस्त निजवैभव से उस तत्व को दिखाना चाहते हैं जो उन्होंने स्वयं अनुभव किया है। अपनी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने के लिये और उसका बेहतर संप्रेषण करने के लिये जो शैली और विधि उन्होंने अपनाई है वो सभी के लिये आदरणीय और अनुकरणीय है।
    
  पहले आचार्य कुंदकुंद की समयसार ग्रंथ में उद्धृत मूल गाथा देखते हैं-

तं एयत्तविहत्तं दाएहं, अप्पणो सविहवेण।
जदि दाएज्ज पमाणं, चुक्केज्ज छलं ण घेत्तव्वं।।
अर्थात्- मैं उस एकत्व विभक्त भगवान आत्मा को अपने निज वैभव से दिखाउंगा (जिसका अनुभव आचार्य ने स्वयं ने किया है)। यदि मैं दिखाऊं (अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति में सफल होऊं) तो उसे प्रमाण करना और यदि चूक जाऊं (कदाचित् संचारक और ग्रहीता के बीच बाधाएं संप्रेषण क्रिया की बाधाएं निर्मित होने पर) तो छल ग्रहण मत करना।

आचार्य यहाँ निजवैभव अपनी समस्त शक्ति लगाकर अपने उस अनुभूत तत्व को दिखाना चाहते हैं जिसे वे मानते  हैं कि इस एकत्व-विभक्त भगवान आत्मा की अनुभूति ही जगत के दुखों को दूर कर सकती है। विचारणीय ये है कि दिगंबर संतों का निजवैभव रुपया, पैसा, जमीन, जायदाद आदि तो होंगे नहीं ऐसे में उनकी शक्ति, उनका समस्त वैभव क्या है जिसे समर्पित कर वे उस अनुभूत तत्व को अभिव्यक्त कर रहे हैं। आचार्य कुन्दकुन्द के निजवैभव का जन्म कैसे हुआ है इसका समयसार ग्रंथ की आत्मख्याति टीका लिखने वाले आचार्य अमृतचंद्र उल्लेख करते हैं जिसे हम चार बिन्दुओं में देख सकते हैं-

1.       सकलोद्भासिस्यात्पदमुद्रितशब्दब्रह्मोपासनजन्मा।
2.       समस्तविपक्षक्षोदक्षमातिनिस्तुषयुक्त्यवलंबनजन्मा।
3.       निर्मलविज्ञानघनांतनिर्मग्नपरापरगुरुप्रसादीकृतशुद्धात्मतत्वानशासनजन्मा।
4.       अनवरतस्यंदिसुन्दरानंदमुद्रितामंदसंविदात्मकस्वसंवेदनजन्मा।
अर्थात्-
1.       स्यात् पद से मुद्रित शब्दब्रह्म (परमागम) की उपासना से निजवैभव का जन्म हुआ है।
2.       समस्त विपक्षी अन्यवादियों द्वारा गृहीत एकान्तपक्ष के निराकरण में समर्थ अतिनिस्तुष निर्बाध युक्तियों के अवलंबन से उस निजवैभव का जन्म हुआ है।
3.       निर्मल विज्ञानघन आत्मा में अन्तर्मग्न परमगुरु सर्वज्ञदेव, अपरगुरु गणधरादिक से लेकर हमारे गुरुपर्यंत समस्त आचार्य परंपरा से प्रसाद से प्राप्त शुद्धात्मतत्व के उपदेशरूप अनुगृह से उसका जन्म हुआ है।
4.       और निरन्तर झरते हुए, स्वाद में आते हुए आनन्द की मुद्रा से युक्त स्वसंवेदन से निजवैभव का जन्म हुआ है।

इन बिन्दुओं में अभिव्यक्ति की उचित शैली के लिये संचारक की पात्रता और गुणवत्ता दोनों को देखा जा सकता है। सिर्फ शब्द मिल जाना, बोलना आ जाना, लिखना आ जाना अथवा कहने के लिये कुछ कह देना; यह संचार नहीं है। संप्रेषण करने के लिये जो विशेषता होना चाहिये वह ध्यान में रखना जरुरी है जब वह विशेषता हमारे कहे या लिखे गये शब्दों के पीछे होती है तभी वास्तव में वे अर्थपूर्ण होते हैं, उनमें वजन होता है और वह अन्य के लिये कार्यकारी होते हैं।

आचार्य के निजवैभव में संचार कौशल की चार मुख्य विशेषता परिलक्षित होती हैं-
1.       अभ्यास
2.       तर्क अथवा एकान्त, मिथ्यापक्ष के निराकरण में समर्थ युक्ति
3.       गुरुप्रसाद अथवा उपदेश (गुरुओं के प्रति विनयवंतता)
4.       अनुभव

यदि हम हमारे संप्रेषण में इन चार विशेषताओं को डालते हैं तो निश्चित ही वह भी सार्थक और अधिक प्रभावी बन पड़ता है। लेकिन देखने वाली बात यह भी है कि इन विशेषताओं के बावजूद आचार्य यह दंभ नहीं पालते कि मैं अपनी बात अन्य तक पहुंचा ही दूंगा, कोई बात समझ में आना न आना यह अन्य की स्वयं की प्रज्ञा पर निर्भर है। ऐसे में आचार्य एक निवेदन जरुर ग्रहीता या अपने पाठक से कर लेते हैं कि यदि वे अपनी बात अन्य तक पहुंचा दें तो उसे स्वानुभव प्रत्यक्ष से स्वयं प्रमाण करना लेकिन किन्हीं वजहों से यदि वे अपना मंतव्य अन्य तक न पहुंचा सकें तो कुछ अन्य, मिथ्या अर्थ लेकर छल ग्राही न बनना।

आचार्य जब कहते हैं कि चूक जाऊं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे अपने प्रतिपादित विषय में असक्षम हैं या उन्हें स्वयं अपने विषय का निर्धार नहीं है। चूकने का कारण संचार की कुछ अन्य बाहरी बाधाएं हो सकती हैं जो कि संचारक और ग्रहीता के मध्य भावनात्मक, सांस्कृतिक, सामाजिक भिन्नताओं की वजह से बनती हैं।

संचार शास्त्री संप्रेषण क्रिया की कुछ प्रमुख बाधाएं निम्न प्रकार बताते हैं-
1)      अपरिचित शब्दावलियां (Unfamiliar terms)
2)      भावनात्मक भिन्नताएं (Emotional Barrier)
3)      दृष्टिकोण की भिन्नताएं (Difference in Perception)
4)      इन्द्रियगत असक्षमता सुनने-देखने आदि में परेशानी (Physical Barriers)
5)      भाषागत अंतर (Language Differences)
6)      पूर्वाग्रह (Prejudices or Stereotype nature)
7)      सांस्कृतिक भिन्नताएं (Cultural Differences)

इस तरह हम देखते हैं कि उपरोक्त बाधाओं के चलते आचार्य अपना मंतव्य दूसरों तक न पहुंचा सकें ऐसी संभावना बन सकती हैं लेकिन उसमें आचार्य का उद्देश्य कतई गलत नहीं है। वे जीवमात्र के प्रति वास्तसल्य और उसके हित की भावना से भरे हुए हैं। ऐसे में कदाचित् चूकने की दशा में वे क्षल ग्रहण न करने का आग्रह करते हैं।

इस गाथा में हम समस्त जैनागम, जैनदर्शन की संचार शैली को देखते हैं। अनेकान्त-स्याद्वाद, प्रमाण-नय-निक्षेप आदि से वस्तु की सिद्धि, प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण की व्यवस्था, जीवमात्र के कल्याण की भावना, सर्वज्ञ से लेकर गणधर और आचार्य पर्यंत एक समृद्ध परंपरा, तर्क-युक्ति का प्रयोग, गहन अभ्यास और स्वानुभव; इन समस्त विशेषताओं को जैनागम, अनुयोगों में देखा जा सकता है। यही वजह है कि जैनआगम, जैनदर्शन के कथन पूर्वापर विरोध रहित हैं और अधिक प्रमाणिक हैं। यहां स्याद्वाद शैली में अनेकान्तात्मक (अनेक गुण-धर्मों वाली) वस्तु का कथन है। कहा जाये तो तात्कालिक सत्य से सार्वकालिक-सार्वभौमिक सत्य का प्रतिपादन है लेकिन कहीं भी तात्कालिक सत्य वस्तु के समग्र प्रतिपादन का दंभ नहीं भरता।

कहा भी है-
जावदिया वयणवया, तावदिया होंति नयवादा।

अर्थात्- जितने कथन हैं उतने नयवाद हैं और सभी कथन अपनी-अपनी अपेक्षा से देखने पर प्रमाणिक हैं। लेकिन ध्यान देने योग्य बात ये हैं कि किसी वस्तु में व्याप्त अनेक धर्मों में से एक का कथन करना वो नयवाद है किन्तु जो धर्म उसमें है ही नहीं उनका कथन करना नय नहीं है। जो धर्म वस्तु में हो ही नहीं उसे भी वस्तु में समाविष्ट करना मिथ्या अनेकान्त है इसी तरह वस्तु में व्याप्त अनेक धर्मों में से किसी एक का ही हठ लेकर बैठ जाना वो एकान्त है जिसके लिये जैनागम में कोई जगह है ही नहीं।

समयसार गाथा पांच की टीका व्यवस्थित संचार कौशल के साथ अपने अग्रिम विषय के प्रति पाठकों को सचेत करती है। इसमें निवेदन भी है, विषय की प्रमाणिकता का उद्घोष भी है और आचार्य की विनम्रता भी प्रतिपादित है। संचार प्रमाणिक, विनम्र, हठाग्रह-पूर्वाग्रह से रहित, तर्कपूर्ण और अनुभूत ही होना चाहिये। यह गुण समयसार ग्रंथ में तो है ही लेकिन इसे समस्त जैनागम में भी देखा जा सकता है। जैनागम की यही प्रमाणिकता सर्वज्ञसिद्धि का आधार बनती है और उन सर्वज्ञ की सिद्धि में वस्तुस्वातंत्रय, अकर्तावाद, क्रमबद्धपर्याय जैसे महान् सिद्धांतों का समावेश भी स्वयमेव हो जाता है। इन महान् सिद्धांतों का निर्णय आत्मानुभूति का कारण बनती है और आत्मानुभूति अनादिकाल के दुखों के मेटने में एकमात्र सहायी है।

ज्ञान का बाह्य में वर्तने वाला संचार जब स्वयं में ही प्रतिष्ठित हो जाता है, जब परिणामों का संचरण स्वभाव की ओर हो जाता है तब यह जीव रत्नत्रय की उपलब्धि कर मुक्तिपुरी में जाकर समस्त संसार के दुखों से छूट जाता है। हमारा भी संचार बाहर से अंतर की ओर उन्मुख हो इस भावना से इस लेख को यहीं विराम देता हूँ।


            लेखक- अंकुर जैन, भोपाल
{शास्त्री, एम.एससी, एम.फिल (जनसंचार) एम.ए(एजुकेशन)}
आलेख संपादक, दूरदर्शन केन्द्र, भोपाल)

Friday, December 2, 2016

ज़ेहन में दबी सुप्त संचेतनाओं पर पानी के छीटें : सम्मेद शिखर स्वर्णजयंती महोत्सव


बिखराव से पैदा, रिश्तों का रेशा वक़्त के बीतने के साथ ही महीन पड़ता जाता है। दूरियां, पहले यादों को धुंधला करती हैं फिर अहसासों को भी। मसलन, नजदीकियों के दरमियाँ आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती लगातार दूरियां, हमें गुजिश्ता तमाम रिश्तों के प्रति असहिष्णु और असंवेदनशील बना देती हैं। संबंधों का तार नये जहाँ और नए हालातों से खुद ब खुद जुड़ जाता है। कतरा-कतरा हम भूल जाते हैं उसी नींव के पत्थर को, जिस पर टिकी होती है हमारी जिंदगी की इमारत। सो जाती है सारी संचेतनायें, जो कभी हमें हम से भी प्यारी हुआ करती थीं।

बदलाव की बयार बहुत कुछ बहा ले जाती है...बहुत कुछ ऐसा भी जो रहना चाहिए था ताउम्र हमारे साथ। बहुत कुछ ऐसा जो करता है हमें जमाने से अलग। बहुत कुछ जो जोड़ता है हमें एक दूसरे से बिना किसी स्वार्थ के। ऐसे में एक-दूसरे से बने रहना लगातार दूर...इस खाई को और गहरा ही बनाता है। तब जरुरत होती है एक मिलन की..जो जगा दे हममें हमारा अक्स। जो करदे जिन्दा उसी उन्माद को जो कभी रहा करता था हमारे साथ। जिस मिलन से एक बार फिर हम कर सके बीते लम्हों की जुगाली। जाग उठे प्यार, अपनापन वैसा ही एक दूसरे के लिए...जो असल में ताकत है हमारी।

हो सकता है अपनी जिंदगी की कसमकस में उलझे हुए, बेचैन हसरतों को पूरा करने में अलग हों रास्ते हमारे। हो सकता है अपना कोई अलग वतन तलाशने में उन रास्तों के पड़ाव भी अलग हों। पर उन रास्तों के पार नज़र आने वाली मंज़िल..हमारा अंतिम गंतव्य नहीं है। जो अंतिम है वो हम सबका एक है। ज्ञानतीर्थ से सिंचित हो असल में तो हम वहां ही पहुंचना चाहते हैं जिसके आगे कोई राह ही नहीं है। तो जब हैं हम पथिक उस एक मोक्षमार्ग के, तो फिर ये अलगाव कैसा। क्यों तात्कालिक के मोहपाश में सर्वकालिक को विस्मृत करना। क्यों सोना। क्यों खोना। क्यों होना, उनसे दूर जो बन सकते हैं जरिया हमें हमसे मिलाने का।

समयसार विधान। तीर्थराज सम्मेदशिखर। स्वर्णजयंती महोत्सव। दरअसल इन तमाम सुप्त संवेदनाओं को झंकृत करने का एक अहम् प्रयास था...जो अपने इस उद्देश्य में दो सौ फीसद सफल हुआ है। निर्वाण धरा पर, हमारी निर्माण स्थली का आयोजन...एक बारगी फिर हममें से कई के पुनर्निर्माण का जरिया बन उठा। जहाँ से फिर जागी हममें वही चिंगारी, जिसे संजोये हम बिताते थे खुशनुमा पल अपनी निर्माण धरा पर।

 'न भूतो न भविष्यति' कहकर मैं आयोजन की बाहरी भव्यता के प्रति कोई अतिरेक पूर्ण बात नहीं कहूंगा। क्योंकि इससे अधिक भव्यता रही भी है, और आगे के आयोजनों में देखने को मिलेगी भी। इस आयोजन में कोई खामियां न रही हो ऐसा भी नहीं है, वास्तव में इतने बड़े प्रयासों का आकलन उन ऊपरी कमियों से नहीं बल्कि उद्देश्यों से किया जाना चाहिए। और जिन उद्देश्यों को लेकर हम जुड़े थे या जिस आंतरिक प्रेरणा ने हमे इस आयोजन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया था उस मंशा पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़े किये जा सकते।

बहरहाल, इस तरह के आयोजन वर्तमान और भविष्य दोनों की दरकार हैं क्योंकि हमारा परिवार अब इतना बढ़ गया है कि हमारे बीच रहने वाली भौतिक दुरी, हमारी भावनात्मक दुरी की भी वजह बन जाती है। 'नज़र से दूर, दिल से दूर' उक्ति पुरानी है पर चरितार्थ हमेशा होती है। इसलिए अच्छा है कि एक दूसरे की नजरों में बने रहे, तो दिल में भी बने रहेंगे। और हमारे इस तरह के मिलन से राख के भीतर दबी चिंगारी को भी हवा मिलती रहेगी।

खैर, कहते-कहते बहुत कुछ कह गया। पर फिर भी काफी कुछ अब भी अनकहा ही रह गया। पर चूँकि हम एक-दूसरे से जज़्बाती तौर पर बंधे हैं तो अल्फ़ाज़ों के पीछे के अहसासों को पढ़ना भी जानते हैं..इसलिए गुजारिश है आपसे इन शब्दों को नहीं, शब्दों की राख के पीछे छुपी जीवंत आग को समझने की कोशिश करियेगा।

Tuesday, November 22, 2016

Tuesday, August 30, 2016

ज्ञानतीर्थ के स्वर्णजयंती वर्ष के बहाने।

कुछ भी आगे लिखने से पहले कुछ सवालों से अपनी बात शुरु करना चाहूंगा..सवाल है कि रेगिस्तान में दूर किसी किनारे पर खड़े वृक्ष की क्या अहमियत है? घनघोर तिमिर में डूबे किसी वन में दीपक की क्या अहमियत है? काल के गाल में समा रहे किसी कई दिनों के प्यासे व्यक्ति के लिये जलबिन्दु की क्या अहमियत हैं? जैसे इन तमाम चीज़ों की कीमत जानते हुए भी बयां करने में हम असमर्थ हैं और इनके बारे में कुछ कहकर जो भी हमा बयां कर दें पर उतना मात्र कहा हुआ कभी भी इनकी असल अहमियत को ज़ाहिर नहीं कर सकेगा। कुछ चीज़ें बस महसूस की जा सकती है उन अनुभूत चीज़ों के बारे में मन में वर्तने वाली श्रद्धा ही उनका असल सम्मान है अल्फाजों के तमाम नगीने भी ऐसी चीज़ों, परिस्थितियों या व्यक्तियों के सम्मान को प्रदर्शित नहीं कर सकते।

टोडरमल स्मारक। यहां से संबद्ध हर व्यक्ति मात्र के लिये कुछ ऐसी ही श्रद्धा का विषय है कुछ लफ्जों में समेट इसके महिमा प्रदर्शन का कार्य अनंत को संख्या में समेटने की गुस्ताख़ी है। पर चुंकि स्वर्ण जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहे इस परिसर की महिमा में कुछ कह देने की औपचारिकता निभाना आवश्यक है तो बस दिल को रखने के लिये कुछ कह देने का उपक्रम कर रहा हूँ। पर ये जानता हूँ कि मेरा तमाम शब्द चातुर्य कम से कम इस विषय में आकर तो असफल होगा ही। क्योंकि यहाँ दुविधा ये होगी कि क्या भूलूं या क्या याद करूं और जो भी याद करुं उसकी शुरुआत कहाँ से करुं।

फिर भी शुरु करता हूँ। वर्ष 2002। कक्षा दस में अध्ययन के दौरान ही कानों में ये सुगबुगाहट शुरु हो गई थी कि आगे पढ़ने के लिये टोडरमल स्मारक में जाना है। उससे पहले तक इस भवन से नाता बस बालबोध-वीतराग विज्ञान के पहले पृष्ठ पर प्रकाशक के नाम पर छपे कुछ शब्दों के तौर पर ही था। लेकिन उन बालबोध और वीतराग विज्ञान के जरिये ही इस भवन की छवि किसी भव्य ज्ञान तीर्थ के रूप में दिलोदिमाग में अंकित थी ये बात अलग है तब तक हम ज्ञानतीर्थ शब्द की व्याख्या करने में समर्थ बुद्धि के धारक नहीं थे। ये कुछ कुछ वैसा ही था जैसे एनसीआरटी या माध्यमिक शिक्षा मंडल की किताबों के पीछे छपे इनके नाम इन परीक्षा बोर्डों के प्रति एक अलग ही कौतुलह पैदा करते हैं वैसा ही कौतुहल उस बालमन में पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट को लेकर था। लेकिन जब 2002 के उस वर्ष में मुझे इस परिसर में जाने का अवसर आया तो स्वभावतः अपने घर और गांव का प्रेम भला कैसे अपनी पगडंडी छोड़कर आगे बढ़ने की इज़ाजत दे देता।

पर कहें कि भली होनहार थी सो लाख घर पर रुकने की कोशिशों के बावजूद भी टोडरमल स्मारक में अगले पांच साल बिताने का सुअवसर हाथ लगा। ये पांच साल, ज़िंदगी के अगले संभावित पचास सालों की आधारशिला रखने को तैयार थे। एक मजबूत आधार शिला। जहाँ सिर्फ संस्कारों का आधार ही नहीं बल्कि तत्वज्ञान के पंख भी हमें मिलने जा रहे थे जिनके सहारे हम इस भव और भवांतरों के भी समंदर को पार करने का साहस रख सकते थे...आत्मविश्वास से संपन्न हो ये साहस कर भी रहे हैं। हां कुछ विसंगतियां अभी भी होंगी जीवन में, किंतु वे निश्चित ही उन संभावित विसंगतियों से कम होंगी जो तब पैदा होती जब हम टोडरमल स्मारक न गये होते। 

टोडरमल स्मारक स्वर्णजयंती वर्ष पर प्रकाशित होने वाली स्मारिका में प्रकाशन हेतु मांगे गये लेख में एक बिंदु है संस्था का समाजहित में योगदान। मैं प्राधिकृत आंकड़ों के आधार पर नहीं बता सकता कि इस व्यापक समाज में टोडरमल स्मारक अपने प्रयासों से क्या योगदान दे रहा है उस निराकार समष्टि को साकार कर प्रस्तुत भी नहीं किया जा सकता। लेकिन कहते हैं व्यष्टि (व्यक्ति) ही समष्टि (समाज) की रचना करता है। किसी भी भले प्रयास को आयाम देते वक्त समष्टि का नहीं व्यष्टि का ही विचार किया जाता है और टोडरमल स्मारक के प्रयासों का समस्त केन्द्रीकरण व्यष्टि के हित में ही रहा है। जी हाँ पांच साल तक एक ऐसे अबोध बालक का निर्माण जो तमाम  दुनियादारी या हित-अहित के विचार से परे बस एक बालक है लेकिन जब वो यहाँ से निकलता है तब स्वयं तो एक आधार स्तंभ बनता ही है साथ ही जहाँ भी वो खड़ा होता है वहीं एक संस्था का काम करता है। अपने आसपास स्थित समस्त परिसर को गुलजार करता है। इस तरह देखें तो एक व्यष्टि का हित ही अंततोगत्वा समाज का हित बन जाता है। इससे पैदा हुए सकारात्मक बदलाव का जो भी हम आकलन करते हैं वो असल से बहुत कम ही होता है। क्योंकि एक स्नातक अपने गुणों की गंध सिर्फ अपने परिवार, जाति या वर्ग विशेष तक ही नहीं फैलाता बल्कि वो धर्म और समाज के इतर भी लोगों में अपने संस्कार और ज्ञान की सौरभ पहुंचाता है।

बात यदि संस्था की कार्यप्रणाली की करुं तो कहना चाहुंगा कि कोई भी प्रणाली या व्यवस्थाएं सफलता का आधार नहीं होती बल्कि उद्देश्य ही सफलता के सुनिश्चितिकरण का आधार होते हैं। आपके उद्देश्य यदि महान हैं तो व्यवस्था की खामियों के बावजूद आप अपने लक्ष्य की उपलब्धि करने में सक्षम होते हैं किंतु यदि उद्देश्यों में ही छल है तो दुरुस्त व्यवस्थाएं भी गंतव्य तक पहुंचाने में सक्षम नहीं है। टोडरमल स्मारक का बीते पचास साल का इतिहास स्वयं इसकी प्रणाली की कहानी बयां करता है। करीब एक हजार विद्वानों की फौज, व्यापक तत्व प्रचार की सुदृढ़ परंपरा, जन-जन तक सत्साहित्य की पहुंच सुनिश्चित करने में यकीनन संस्था की कार्यप्रणाली का हाथ नहीं हो सकता बल्कि उन उद्देश्यों का हाथ हैं जिनको लेकर संस्था काम करती है। पचास साल की इस यशस्वी परंपरा को अगले पचास साल और कहें कि अगले पांच सौ साल या इसके परे भी ले जाना है तो उन महान् उद्देश्यों के साथ समझौता नहीं करना है जिनका आधार पूज्य गुरुदेव श्री और आदरणीय छोटे दादा के द्वारा रखा गया है। इन उद्देश्यों के सहारे चाहे किसी भी प्रणाली का लिबास क्युं न हों उसका सफल होना तय है।

टोडरमल स्मारक और जैनतत्वज्ञान के शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की बात करें तो आज समाज में संचालित दर्जन भर से ज्यादा संस्थाएं टोडरमल स्मारक की सफलता की गवाही दे रही हैं। यदि इस क्षेत्र में टोडरमल स्मारक का योगदान नगण्य होता तो निश्चित ही खुद टोडरमल स्मारक महाविद्यालय ही काल के प्रवाह में कहीं खो गया होता लेकिन ये तो दोगुनी शक्ति से बढ़ ही रहा है साथ ही कई अन्य को भी इस जैसा बनने के लिये प्रेरित कर रहा है। ये प्रतिस्पर्धा अच्छी है हम तो चाहेंगे सब टोडरमल स्मारक जैसा बनना चाहें बल्कि इससे भी आगे निकलने का प्रयास करें क्यों कि इन प्रयासों से अंततः जिनशासन को ही गति मिलेगी। लेकिन प्रतिस्पर्धा के बीच आलोचना के सुर तेज करना समझ से परे हैं। ये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहीं बाजारु न हो जाये इसका ध्यान रखना जरुरी है क्योंकि ये समझ लें कि भले ही कोई नई संस्था टोडरमल स्मारक से ज्यादा ऊंचाई हासिल कर ले लेकिन टोडरमल स्मारक जितनी गहराई पा लेना आसान काम नहीं है। आज विरोधी संस्थाओं के बीच भी जो खुद को बेहतर बनाने की होड़ है वो भी टोडरमल स्मारक की ही देन हैं। इस तरह यदि मैं कहूं कि तमाम क्रियाकांड के बीच शिक्षा के क्षेत्र में जितना भी जैन तत्वज्ञान विद्यमान है वो सिर्फ और सिर्फ टोडरमल स्मारक की वजह से है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

इन सबके बावजूद बेशक हम खुद की बीते सालों की उपलब्धियों से नई ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त करें किंतु इन गुजरे वर्षों की सफलता के व्यामोह में अंधा हमें नहीं होना है। इस धारा को अक्षुण्ण रखना है तो गुजरे वक्त से ज्यादा अपने वर्तमान और भविष्य पर नजर रखना है। अपने उद्देश्यों में किसी भी भांति कलुषता नहीं आने देना है। पद, प्रतिष्ठा और पैसे का वर्चस्व कम से कम हमारी इस मातृ संस्था में तो न रहे। परस्पर साधर्मी वात्सल्य और सरलता से सहयोगी वृत्ति बनाये रखें। राजनीति और छल का प्रवेश यहाँ न होने पाये इसके लिये समग्र प्रयासों की जरुरत है। आलोचना और अपनी निंदा को भी सुने तथा उसे अंतर्मन से गुने भी, यदि आलोचना सही है तो उन गलतियों को सुधारें। और यदि आलोचना निरर्थक है तब भी आलोचना करने वाले पर द्वेष या वैमनस्य न बरतें। हमें सहिष्णु भी होना है और साहसी भी। प्रतिकार करें, प्रतिस्पर्धा भी करें पर प्रतिद्वंदी किसी के भी न बने। सफलता में प्रसन्न हों किंतु असफलता में खेदखिन्न नहीं। थोड़ा ही सही पर अपने अपने स्तर पर प्रयास जरुर करें क्योंकि हम सब द्वारा थोड़े-थोड़े अंशों में सींचे गये जल से ही इस बोधिवृक्ष का पल्लवन बरकरार रहेगा। मेरा अपने हर शास्त्री भाई से निवेदन है कि टोडरमल स्मारक के स्वर्णिम अतीत ने हमारा वर्तमान गढ़ा है अब हमारे वर्तमान का ये फर्ज है कि हम इसका भविष्य यशस्वी और जीवंत बनायें।
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