हमारा स्मारक : एक परिचय

श्री टोडरमल जैन सिद्धांत महाविद्यालय जैन धर्म के महान पंडित टोडरमल जी की स्मृति में संचालित एक प्रसिद्द जैन महाविद्यालय है। जिसकी स्थापना वर्ष-१९७७ में गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की प्रेरणा और सेठ पूरनचंदजी के अथक प्रयासों से राजस्थान की राजधानी एवं टोडरमल जी की कर्मस्थली जयपुर में हुई थी। अब तक यहाँ से 36 बैच (लगभग 850 विद्यार्थी) अध्ययन करके निकल चुके हैं। यहाँ जैनदर्शन के अध्यापन के साथ-साथ स्नातक पर्यंत लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था है। आज हमारा ये विद्यालय देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। हमारे स्मारक के विद्यार्थी आज बड़े-बड़े शासकीय एवं गैर-शासकीय पदों पर विराजमान हैं...और वहां रहकर भी तत्वप्रचार के कार्य में निरंतर संलग्न हैं। विशेष जानकारी के लिए एक बार अवश्य टोडरमल स्मारक का दौरा करें। हमारा पता- पंडित टोडरमल स्मारक भवन, a-4 बापूनगर, जयपुर (राज.) 302015

Tuesday, May 25, 2021

यौम ए अज़्म (संकल्प दिवस) पर ‘दादा’ (डॉ हुकुमचंद जी भारिल्ल) के लिये पेश ए खिदमत इक मुख़्तसर नज़्म



बड़ी पाकीजगी से मुसलसल जो सफ़र गुज़रा।

बयां हो अज़्म कैसें यूं, मिला जो आपसे दादा।।


कलम की जान हो तुम, और तुम फख्र ए सहाफत भी।

हर इक तहरीर पे जिनकी फ़साहत नाज़ है करती।


हर इक लब रहे जारी तुम ऐसा साज़ हो दादा।

ख़िलाफ़-ए-मालिकाना ज़हन, सख़्त आवाज़ हो दादा।।


जमाने का मजाजी इश्क़, छुड़ाया अपने बयानों से।

हकीकी इश्क़ का जो इल्म, दे डाला बखानों से।।


सबक फ़ितरी के दे डाले, मुसलसल-हाल समझाया।

मसलक-ए-फ़िक्र-ओ-'अमल', भी तुमने ही बतलाया।।


खुदी को जान खुदा होने के हो इल्म में माहिर। 

हो टोडरमल की धारा के, हुकुमचंद नाम जगजाहिर।।


कभी अल्फ़ाज़ का जामा, दिया अंदाज़-ए-अक़ीदत को।

है बदला फितरत ए इंसां, और मज़ाजी उल्फत को।।


थी मजहब के फ़रेबों में, दबी ये रूह अरसे से। 

उसे हर आमो-खास इंसा को किया मुमकिन बड़ा तुमने।।


गुरु ‘कहान’ ने जहाँ छोड़ा, बढ़ाई है सिफ़ारत ये।

दिये फरमान मुनियों के, मु’अल्लिम’ बन नज़ाकत से।।


तुम्हारी यौम ए पैदाइश पे, है ये अज़्म हम सबका।

करेंगे बस वही ताउम्र, है राह-ए-नजात जो बंधन का।।


~ अंकुर जैन, भोपाल


शब्दार्थ- मुसलसल- लगातार, मुख्तसर- संक्षिप्त, सहाफत- विशिष्ट प्रकार के लेखक, अज़्म- संकल्प, पाकीजगी- शुद्धत्ता, तहरीर- लेखन, फसाहत- स्वाभाविक लेखकीय प्रवाह, खिलाफ ए मालिकाना जहन- परकर्तत्वबुद्धि, मजाजी इश्क- भौतिक प्रेम, हकीकी इश्क- आध्यात्मिक प्रेम, इल्म- ज्ञान, फितरी-सहजता, मुसलसल हाल- क्रमबद्धपर्याय, मसलक ए फिक्र ओ अमल- जीवन जीने की कला, अकीदत- श्रद्धा, मजाजी उल्फत- विषयों की इच्छा, सिफारत-मिशन, मु’अल्लिम’- धर्मज्ञान देने वाला, यौम ए पैदाइश- जन्मदिन, राह ए नजात- मुक्ति का मार्ग

Friday, November 20, 2020

“जब कोई फूल मेरी शाख ए हुनर पर निकला” (बड़े दादा रतनचंद जी भारिल्ल के जन्मदिवस पर विशेष लेख)

 



एक मशहूर ऊर्दू का शेर कुछ यूं है... मैंने उस जान ए बहारां को बहुत याद किया। जब कोई फूल मेरी शाख ए हुनर पर निकला। ज़िंदगी के अनेक पड़ावों को पार करते हुये और एक अदद मयस्सर मुकाम को तांकते हुये हम बहुत कुछ मुकम्मल पा जाते हैं और बहुत कुछ नहीं भी पा पाते हैं। जब कुछ पा जाते हैं तो अपने ही हुनर के गुमान में चूर हो उन अनेक दरख़्तों को भूल जाते हैं जिनके अक्स का कतरा कतरा संजोकर हम वो बन पाते हैं जो हम आज हैं। असल में हम खुद में उन अनेक शख्सियतों को ज़िंदा रखे होते हैं जिनके कतरा कतरा योगदान से हम वो बन सके हैं जिसे देख दुनिया कभी हमारे फ़न पर तालियां बजाती है तो कभी हमारे इल्म को देख तारीफ में कसीदे गढ़ती है।

      बड़े दादा। पंडित रतनचंद जी भारिल्ल। बड़े और दादा ये दोनों ही शब्द अपने अपने अर्थों में गुरुत्व को संजोये हुये हैं और जब ऐसे गुरुत्व से लबरेज दो शब्द एक ही शख्स का पर्याय बन पड़े हों तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस व्यक्ति के गुरुत्व को बयां करना कितना मुश्किल काम है। गुरुत्व के पैमाने सिर्फ ऊंचाईयों से आंकना बेमानी माना जाना चाहिये.... कई मर्तबा गहराईयां भी बड़े होने का प्रतीक होती हैँ। मसलन, यूके लिपटस के पेड़ भले बरगद से ऊंचे हो सकते हैं लेकिन बरगद की गहराईयां और उसकी गुरुता को कभी किन्ही वृक्षों की तात्कालिक ऊंचाईयों से नहीं आंका जा सकता। बस कुछ यूं ही समझ लीजिये कि हो सकता है कि कई पैमानों पर बड़े दादा के व्यक्तित्व में वो ग्लैमर नजर न आये जिसे देख जमाने का तालियां पीटने को दिल करता हो लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक अदद कल्चर के दर्शन आपको हमेशा होंगे जो सदाबहार एक सौंधी सौंधी महक बिखेरता हुआ नजर आयेगा। और यकीन मानिये जब ग्लैमर सोने की लंका की तरह कहीं गुमान में अपनी आहें भर रहा होता है तब कल्चर किसी शांत वन में रोशन होती कुटिया में सांस ले रहा होता है। और इतिहास गवाह है कि सोने की लंका जल जाती है और वन की वो शांत कुटिया तुफानों के बीच भी जीवंत बनी रहती है। बड़े दादा की ऐसी ही गहराई उन्हें काबिल ए गौर बनाती है।

      बात फिर वहीं ले जाता हूँ जहां से शुरु की थी कि आज हम जहां भी जो कुछ भी हैं उसमें बड़े दादा के अक्स को भुला पाना शायद मुमकिन नहीं होगा। विषमताओं के बीच धैर्य का जीवंत पाठ पढ़ाता कोई गुजरा दरख्त आंखों के सामने यदि जब तब उभरता है तो वो हैं बड़े दादा। अपेक्षा अथवा उपेक्षा के भंवर के बीच भी कोई गर अपनी सौम्य मुस्कान को एक सम बनाये रखता था तो वो हैं बड़े दादा। आगम के अथाह समंदर में गोते लगाकर तलाशे गये गूढ़ गलियारों की बजाय, जो लोगों को सुख के सरल राजमार्ग का तार्रुफ कराता था तो वो हैं बड़े दादा। अपनी संभावनाओं को जानते हुये भी जो अपने दायरों को समझ सदा किसी दूसरे के व्यक्तित्व पर अतिक्रमण करने से पहरेज करते रहे हैं वो हैं बड़े दादा। जो कभी त्याग का, कभी प्रेम का, कभी साम्य का तो कभी करुणा का पर्याय बन हम सबके सामने आते हैं वो हैं बड़े दादा। ऐसी तमाम खूबियां गिनाने के बाद भी हम उस व्यक्तित्व को संपूर्णतः बयां कर दें ये आसान नहीं है। और यकीन मानिये ये ऊपर गिनाई गईं कुछेक खूबियों में से यदि कुछ हमारे जीवन का भी हिस्सा बन सकी हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण रहा है उस महान् दरख्त की छाया में हमारा भी पल्लवित होना। हम जहाँ और जैसे बड़े होते हैं दरअसल वैसे ही गढ़े होते हैं। बड़े दादा के प्राचार्यत्व में टोडरमल स्मारक में अध्ययन करते हुये हमने जीवन का वो समय गुजारा है जिस वक्त में एक बालक से युवा होते हृदय पर सबसे ज्यादा अपने परिवेश का प्रभाव पड़ता है। इसलिये मैं या मेरे जैसे अन्य सैंकड़ों छात्रों पर ताउम्र बड़े दादा का प्रभाव जिंदा रहने वाला है या यूं कहें कि हममें कहीं किसी कोने में बड़े दादा ही जी रहे हैं।

      बड़े दादा के अन्य तमाम अवदानों पर अनेक बातें कही गई हैं उन्हें दोहराना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। मैं तो उन्हीं अवदानों में से एक का जिक्र यहां पुनः कुछ अलग दृष्टिकोण से करना चाहूंगा कि परछाई होकर भी अपने हमसाये से कोई होड़ न करना कितना चुनौतीपूर्ण और कितने महान् आदर्श को दर्शाता है। राम की परछाई लक्ष्मण का हो जाना फिर भी बहुत आसान है या अकलंक के लिये निकलंक के बलिदान देने जैसे प्रसंग भी अनेक देखने को मिल जायेंगे। लेकिन क्या कभी ऐसे उदाहरण गिनाये जा सकते हैं कि लक्ष्मण के हुनर को बढ़ाने के लिये राम परछाई हो गये हों या बृहद हितों को ध्यान में रखते हुये अकलंक ने निकलंक के लिये त्याग किया हो। चीज़ें सुनने और समझने में हो सकता है बहुत आसान जान पड़े। लेकिन इस परिस्थिति के तल में जाकर विचार किया जाये तब शायद हमें बड़े दादा की गुरुता का अंदाजा लग सके। ताउम्र श्रेय लेने में पीछे रहने वाले और चुनौतियों के सामने आगे रहने वाले बड़े दादा, एक ऐसे राम की तरह रहे हैं जिसने वृहदतर हितों को ध्यान में रखते हुये लक्ष्मण की परछाई बनने में कभी खुद के अहम् को आड़े आने नहीं दिया। वे ऐसे अकलंक रहे हैं जिसने निकलंक की प्रतिभा को भांप उसे बड़े फलक पर फैलने के लिये परवाज प्रदान किये। यकीनन छोटे दादा यानि आदरणीय डॉक्टर हुकुमचंद भारिल्ल का निर्माण उनकी अपनी लायकात से ही हुआ है लेकिन उपलब्धियों के गगन में अपने हुनर के पंखों से उड़ान भरने वाले छोटे दादा को माकूल आबो-हवा प्रदान करने में बड़े दादा के योगदान को कतई कमतर नहीं माना जा सकता। यदि हम ये कहें कि बड़े दादा न होते तो शायद छोटे दादा का भी वो व्यक्तित्व हमारे सामने न आता जो समाज के एक बड़े तबके को दिशा देने वाला बना।

      और जैसा मैंने इस लेख में पहले भी जिक्र किया कि अपनी कृतियों में भी बड़े दादा ने आगम के गूढ़ गंभीर सिद्धांतों को समझाने के लिये पेचीदा गलियारों का सहारा नहीं लिया बल्कि जनता की नब्ज को टटोलकर उन्हें आधुनिक अंदाज में मिठाई के भीतर रखी रोगमुक्ति की दवाई का आस्वादन कराया। बड़े दादा का न होना, उस महान परंपरा के अस्तित्व से भी इंकार की तरह होगा जिसकी सफलता की नई नई इबारतें गढ़कर हम इस कामयाबी पर इतरा रहे हैं। बड़े दादा किसी महान् पुस्तक के उस अहम् वरक़ की तरह हैं जिसे निकालकर पूरी किताब के मायनों को समझना ही हमारे लिये मुमकिन न होगा।

      बहुत क्या कहें... आपकी कृतियां ही आपका व्यक्तित्व हैं। और जिन्होंने अपने अंतस में बसे सैंकड़ों मनोभावों और विचारों को अपनी कृतियों के जरिये साकार किया है उन्हें समझने के लिये तो इन कृतियों का ही आस्वादन करना श्रेष्ठतम होगा। किसी एक लेख में आपके व्यक्तित्व को समेट सके ऐसी किसी कलम में ताकत नजर नहीं आती। एक जीता जागता इंसान अपने आप में खुद किसी विशाल पुस्तकालय से कम नहीं होता और यदि वो इंसान बड़े दादा जैसे विराट व्यक्तित्व को लिये हो तो उसे भला और किन उपमाओं से दर्शाया जा सकता है और भला कैसे किसी लेख की चंद पंक्तियो में समेटा जा सकता है।

      जन जन को संस्कारों का दिग्दर्शन दे, दुर्भावों से बचाने के लिये अपने भावों का फल दिखा आपने सम्यग्दर्शन का मार्ग प्रशस्त किया है। आपने विदाई की बेला से पहले ही ये विचारने की शक्ति दी है कि जीवन में हमने ऐसे क्या पाप किये जिससे सुखी जीवन दूभर हो गया। समाधि और सल्लेखना की विधि बताकर निरंतर द्रव्यदृष्टि को पुष्ट किया। ऐसे सुअवसर मिलने के बाद भी यदि चूक गये तो ऐसी दशा से भी आपने सचेत किया जिसके बारे में हमने सोचा ही न था। जैनदर्शन के नींव के पत्थरों का परिचय कराकर आपने इस अमिट सिद्धांत को हमारे हृदयों में अंकित किया जो पर से कुछ भी संबंध नहीं का पाठ हमें पढ़ाता है। शलाका पुरुषों, हरिवंश के नायकों और जम्बूस्वामी जैसे महान आदर्शों की कथायें बताकर हमें चलते फिरते सिद्धों जैसे गुरुओं के पथ पर ही आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। णमोकार महामंत्र, पंचास्तिकाय, श्रावकाचार और जिनपूजन आदि के रहस्यों को समझाकर हमें जिन खोजा तिन पाईयां के लिये उत्साहित किया।

      वास्तव में आपको जानना, आपको पढ़ने से ही संभव है। इन आलेखों के आलोक में आपकों कदाचित देखा तो जा सकता है पर समझा नहीं जा सकता। खुद के जीवन को देख बस इतना ही कह सकता हूँ कि जीवन की तमाम उपलब्धियां और खुद में सहज ही गढ़ी गई विशेषताओं की बुनियाद आप ही हो। आपको संपूर्णतः अलग कर मैं शायद खुद को भी निहार पाने में असफल ही रहूंगा। हालांकि आपके पढ़ाये अनेक पाठों में से स्वावलंबन, आत्मबल और आगमबल के पाठ भी समाहित हैं। ऐसे में भले हम भेदविज्ञान की राह में स्वावलंबी होकर आगमबल से आत्मबल पाने की ओर अग्रसर हैं लेकिन यदि इस उपलब्धि को भी हम पा गये तो उसमें भी आपके योगदान को विस्मृत करना बहुत बड़ी गुस्ताखी होगी।

      आखिर में इन पंक्तियों से आपको स्मरण कर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करूंगा।


तुम्हारे जाने से एक वरक़ पलट गया।

वो एक आसमां कहीं से सरक गया।।

Tuesday, May 12, 2020

तो... हमारा भी शगल है आंधियों में कश्ती चलाने का !!!



आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज हृदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

शिवमंगल सिंह सुमन की यह कविता बहुतों ने कई मर्तबा सुनी होगी... पर अल्फाज़ तब तक महज कोरे हर्फ ही बने रहते हैं जब तलक उन्हें साकार कर सकने की कुव्वत मानव पैदा न कर सके। कोरोना संक्रमण काल के दरमियां जब जिंदगियां थमी हैं और कुदरती तौर पर अनचाहा ही सही, पर विराम का वक्त अनायास ही विचार का वक्त बन पड़ा है। ऐसे में जिनशासन की पताका को बदस्तूर पूरी शिद्दत के साथ लहराने में टोडरमल स्मारक और इसके नेतृत्व से ओतप्रोत हो अन्य संस्थाओं ने एक बार फिर चुनौती को अवसर में बदलकर मिसाल कायम कर दी है। सुमन की इन पंक्तियों के मायनों को चरितार्थ कर एक उदाहरण आध्यात्मिक जगत के समक्ष खड़ा कर दिया है। अध्यात्म जगत में क्रांति लाने वाले महान युगपुरुष पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के प्रभावना योग को जिस संकल्पना के साथ निभाने की जरुरत थी उसे एक मर्तबा फिर टोडरमल स्मारक और इसकी छत्रछाया में चल रही अर्हं पाठशाला ने चरितार्थ कर दिखाया है।


करीब तेरह हजार की विशाल संख्या में लगभग सवासौ कक्षाओं का एकसाथ संचालन कर और जबरदस्त प्रबंधन के जरिये उन धारणाओं को विफल कर दिखाया है जो कहा करती थीं कि प्रभावना के कार्य अनुकूलताओं के मोहताज हैं। जब बतौर ऑब्जर्वर इन कक्षाओं का अवलोकन करने का अवसर मिला तो लगा कि क्या हुआ गर हम प्रशिक्षण शिविर न लगा सके... क्या हुआ कि हर वर्ष लगने वाले सैंकड़ो ग्रुप एवं बाल संस्कार शिविर अब न लग सके... क्या हुआ कि स्थानीय स्तर पर धार्मिक गतिविधियों पर विराम लग गया। हम यानि टोडरमल स्मारक जिस उद्देश्य के साथ गढ़े थे और कालांतर में उसी उद्देश्य के साथ आगे बढ़े थे वही अब भी कर रहे हैं और कायनात के आखिरी पल यानि इस अवसर्पिणी में पंचमकाल के आखिरी समय तक करेंगे क्योंकि सच्ची बात ये है कि हमें कुछ और करना आता ही नहीं है।

      संक्रमण काल के दौरान जबकि प्रभावना का दंभ भरने वाले अनेक स्तंभ इंतजार कर रहे थे हम इतिहास गढ़ रहे थे। क्या ये सहज यकीन कर सकने वाली घटना है कि तेरह हजार की संख्या नेटफ्लिक्स या अमेजन पर वेबसीरीज देखने के लिये दीवानी नहीं हुई। क्या इस दौर में आप ये सहज मान सकते हो कि इन कक्षाओं में फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ या बॉयोलॉजी की कथित लौकिक शिक्षा के बगैर बच्चे पूरी जागरुकता के साथ आत्मा-परमात्मा का इल्म (ज्ञान) अर्जित कर रहे हैं। जो भले बड़ी डिग्रियां इन बच्चों को न दिला सके लेकिन एक बेहतर किरदार इन बच्चों को मुहैया करायेगा जिसकी गंध से आसपास का जर्रा जर्रा महकता नजर आयेगा। किसी ने बड़ी सुंदर बात कही है-

डिग्रियां तो पढ़ाई के खर्चों की रसीदें हैं...
इल्म तो वही है जो किरदार में नजर आये।

      और यकीन मानिये इस विशाल ऑनलाइन ई शिविर में जो ज्ञान बच्चे, युवा, प्रौढ़ सीख रहे हैं वह लॉकडाउन के बाद भी उनके किरदार मे दिखेगा। लोगों के बीच ये खालीपन, ये कुछ खो दिया हो ऐसी महसूसियत, अप्रकट-अकथित खौफ और भविष्य के मनगढ़ंत कयासों की उधेड़बुन जैसी अनेक मनोवृत्तियों के बीच जो कुछ भी टोडरमल स्मारक और अर्हं पाठशाला द्वारा दिया जा रहा है वो ज़ेहन की ज़मी पर अरसे तक जमा रहने वाला है। बकौल टोडरमलजी- इस भव में अभ्यास करके कदाचित् परलोक में तिर्यंचादि गति में भी जाये तो वहां संस्कार के बल से देव-गुरु-शास्त्र के निमित्त बिना ही सम्यक्त्व हो जाये, क्योंकि ऐसे अभ्यास के बल से मिथ्यात्व का अनुभाग हीन होता है। जहाँ उसका उदय न हो वहीं सम्यक्त्व हो जाना है। जिस माहौल के दरमियां हम ये कोशिशें कर रहे हैं वो कोरी नहीं जाने वाली, क्योंकि बात निकली है तो दूर तलक जायेगी।


      ये वक्त हमें समझा रहा है कि जीवन के अथाह प्रवाह में हम सब छोटे छोटे द्वीप हैं, उस प्रवाह से घिरे हुये भी, उससे कटे हुये भी... भूमि से बंधे और स्थिर भी पर प्रवाह में सदा असहाय भी- न जाने कब प्रवाह की एक स्वैरणी आकर मिटा दे और बहा ले जाये.... फिर चाहे द्वीप का फूल पत्ते का आच्छादन (भौतिक सुख सुविधा) कितनी ही सुंदर क्यों न हों। इस अहसास के बीच पर्यायों की क्रमबद्धत्ता का बोध होना अधिक आसान बन पड़ता है। इस वक्त भलीभांति समझा जा सकता है कि वो कथित भविष्य है ही नहीं जिसकी चिंता में हम सूखे जा रहे हैं- एक निरंतर विकासमान वर्तमान ही सब-कुछ है। पानी के फव्वारे पर टिकी हुई गेंद के मानिंद... बस जीवन वैसा ही, क्षणों की धारा पर उछलता हुआ सा- जब तक धारा है तब तक बिल्कुल सुरक्षित, सुस्थापित। नहीं तो पानी पर टिके रहने से अधिक बेपाया क्या चीज़ होगी ऐसे ही पर्यायों की इस धारा के बीच वहीं क्षण सार्थक है जो त्रिकाली को विषय बनाने के लिये उद्यत हो अन्यथा पर्यायों सी बेपाया चीज़ पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, हम आखिर पा भी क्या रहे हैं महज एक व्यर्थ और व्यग्र वर्तमान तथा भविष्य के।

      वस्तुतः बहुतेरे लोगों का साध्य जीवन का आनंद न रहकर, जीवन की सुविधाएं भर रह गया है, आज हम जीवन के शोध की नहीं, जीवन के दौड़ की बात कहने लगे हैं। अंधी दौड़ की आपाधापी के इस समय में चिंतन का आधार उपलब्ध कराने का उपक्रम अनेक अर्थों में प्रशंसनीय है। और हर वो छोटा-बड़ा शख्स जो इस ज्ञान यज्ञ में अपने योगदान की आहूति दे रहा है वो अभिनंदनीय हो गया है।


    
  मैं ये नहीं कहता कि किसी प्रयास में कोई नुक्स नहीं होते... यकीनन वे होते हैं लेकिन उद्देश्यों की महानता प्रयासों की कमी को धूमिल कर देती है। जिस महान उद्देश्य को लेकर हम बढ़ रहे हैं वो चिंगारी ज्वाला में ज़रूर बदलेगी और इस हजारों की संख्या में से चंद लोग तो ऐसे ज़रूर तैयार हो सकेंगे जो शब्दों की राख के नीचे छिपी चैतन्य की जीवंत आग को पकड़ सकेंगे।

     देखा जाये तो हमने लॉकडाउन के दरमियां बीते दो महीने से ही सतत् ज्ञान ज्योति प्रज्वलित रखी है। अनेक विद्वानों के नियमित लाइव प्रवचन, ज्ञान गोष्ठियां, बाल संस्कार शिविर उन्हीं नियमित प्रयासों का परिणाम रहे हैं। मसलन हर किसी के लिये अपनी रुचि, बुद्धि और जिज्ञासा के अनुरूप विषय उपलब्ध कराये ही गये है उन सभी प्रयासों को भी टोडरमल स्मारक से अलग कर नहीं देखा जा सकता। पूज्य गुरुदेव श्री के प्रवचनों का सतत् प्रसारण, छोटे दादा डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल के समय समय पर मिले उद्बोधन, संजीव जी भाईसाहब, मनीष जी, विपिन जी आदि विद्वानों की नियमित कक्षायें, प्रासंगिक गोष्ठियां और अनेक विद्वानों द्वारा स्थानीय स्तर पर चलाई गई ऑनलाइन कक्षायें सभी इसी ज्ञानगंगा से निकली सरिताएं ही हैं। इनका मूल्यांकन लोगों की संख्या के आधार पर नहीं, तत्वबोध की जिज्ञासाओं के प्रशमन के आधार पर किया जाना चाहिये जो सभी के द्वारा अपने-अपने स्तर पर सार्थक सिद्ध हुई हैं। इन समान धाराओं को परस्पर प्रतिस्पर्धा भी न माना जाये, दरअसल ये सब एक दूसरे की पूरक ही हैं। अतः इन्हें इस नजर से न देखा जाये कि फलां के प्रवचन को पांच हजार व्यू मिले, फलां को पांच सौ और फलां को पचास। इन धाराओं को देख दुष्यंत की कविता को आज के संदर्भ में नये सिरे से याद करने को जी चाह रहा है-

सिर्फ दर्शक व्यू बढ़ाना ही मेरा मकसद नहीं
श्री जिनेन्द्र की देशना हृदय उतरना चाहिये।
मेरे यूट्यूब पर नहीं तो तेरे यूट्यूब पर सही
हो कहीं भी तत्व लेकिन तत्व बहना चाहिये।
     
      कोरोना संक्रमण काल के बाद जो दौर आयेगा वो एक नई संस्कृति विकसित करेगा... दुनिया विभिन्न प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिये वक्त के माकूल बदलने की जुगत में लग रही है और हमें खुशी है हमने बने हुये पदचिन्हों पर चलने के बजाय खुद पदचिन्ह बनाये हैं। अब आश्चर्य नहीं कि अनेक सभाओं मे जैसे गुरुदेव के प्रताप से तत्व की झांकियां देखादेखी ही सही, पर नजर आने लगी हैं कुछ ऐसा ही इन प्रयासों के बाद भी दिखने लगे।  

      जो इन कोशिशों की आलोचना कर रहे हैं उनका भी स्वागत है और उनसे भी हम सीखेंगे। लेकिन एक सवाल ये भी है कि सोचिये यदि हम ये भी न कर रहे होते तो आखिर क्या कर रहे होते। कैसे ये संक्रमण काल स्व-स्मरण का काल बनता। कैसे विराम का वक्त विचार के वक्त में बदलता। महज, चारों ओर बिखरी पीड़ा, मौतों के आंकड़े, बेचैनियों के भंवर की चर्चा कर ही इष्ट सिद्धि तो संभव नहीं हो सकती न। और जिस जंगल के वृक्ष पर हम बैठे हैं जब वहीं आग लगी हो तो जो भी जितना भी जैसा भी समय हो क्यों न उसे जिनवाणी के अभ्यास, तत्व विचार और भेदविज्ञान में न लगा दिया जाये। आचार्य पूज्यपाद लिखते हैं-

विपत्तिमात्मनो मूढ़ः परेषामिव नेक्षते।
दह्यमान- मृगाकीर्णवनांतर- तरुस्थवत्।

यानि दावानल की ज्वाला से जल रहे मृगों से आच्छादित वन के मध्य में बैठे मनुष्य की तरह मूढ़ प्राणी अन्य की विपत्ति तो देखता है पर अपनी विपत्ति की सुध नहीं लेता।

यकीन मानिये इस दौर में अखबार पढ़के, समाचार चैनलों को देखकर, रागरंजित उपन्यास आदि पढ़के, फिल्में या टीवी सीरियल देखके या मोबाइल पर गेम खेलकर अथवा किसी अन्य तरीके से समय ज़ाया कर दरअसल आप खुद को ही बरबाद करेंगे तो क्यों न इस बीतते वक्त को जिनवाणी के अभ्यास में लगा दिया जाये... जो वास्तविक और स्वाधीन आनंद की राह प्रशस्त करने वाला बन सके। इन तमाम विषयों पर विचार कर ये समझ आता है कि क्यों आखिर टोडरमल स्मारक और अर्हं पाठशाला का यह प्रयास अद्भुत बन पड़ा है।

मुनिराज पद्मप्रभमलधारिदेव ने नियमसार ग्रन्थ की आठवीं गाथा की टीका करते हुये जिनोद्भूत परमागम की महिमा गाते हुये लिखा है- जो भव्यों को कर्णरूपी अञ्जलिपुट से पीनेयोग्य अमृत है, जो मुक्ति सुंदरी के मुख का दर्पण है, जो संसार समुद्र के महाभंवर में निमग्न समस्त भव्यजनों को हस्तावलम्बन देता है, जो सहज वैराग्यरूपी महल के शिखर का शिखामणि है, जो कभी न देखे हुये मोक्ष-महल की प्रथम सीढ़ी है, और जो कामभोग से उत्पन्न होने वाले अप्रशस्त रागरूप अंगारों द्वारा सिकते हुये समस्त दीन जनों के महाक्लेश का नाश करने में समर्थ सजल मेघ के समान है जिसमें सात तत्व और नव पदार्थ कहे हैं ऐसे महान् महिमावंत जिनवचनों से युक्त द्रव्यश्रुत यानि जिनवाणी के अभ्यास में क्यों न जीवन लगाया जाये क्योंकि

जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा।
खीयदि मोहोवचयो तम्हा सत्थं समधिदव्वं।

अर्थात्- जिनशास्त्र द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से पदार्थों को जानने वाले के नियम से मोह का क्षय हो जाता है इसलिये शास्त्र का सम्यक् प्रकार से अध्ययन करना चाहिये।

इसलिये और ज्यादा क्या कहें रस्म-ए-दुनिया भी है मौक़ा भी है और दस्तूर भी... कि तमाम व्यर्थ चेष्टाओं से विराम लें और अपने प्रयोजन को सर्व प्रकार से इस वक्त में साध लें-

विरम किमपरेण कार्यकोलाहलेन
स्वयमपि निभृतः सन्. पश्य षण्मासमेकम्।
हृदयसरसि पुंसः पुद्गलाद् भिन्नधाम्नो
ननु. किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धिः॥

मौजूदा हालात देख लग रहा है कि संभवतः कम से कम छह माह का वक्त तो ऐसा ही बीतने जा रहा है तो क्यों न सभी अकार्य कोलाहल से विरक्त हो स्वयं को शरीरादि पुद्गलों से भिन्न अनुभवने के मार्ग में आगे बढ़ा जाये और उसका सबसे प्रबल हेतु आगम का अध्ययन है। कहा भी है आगमचेट्ठा तदो जेट्ठा।

इसलिये अब तो स्वयं को सर्वप्रकार से आगम में झोंकते हुये आचार्य अमृतचन्द्र के उस कथन को सार्थक करना है कि ततो नान्यद्धतर्म निर्वाणस्येत्यवधार्यते। अलमथवा प्रलपितेन। व्यवस्थिता मतिर्मम। नमो भगवद्भयः। अर्थात् अब मुझे जिनोपदिष्ट निःश्रेयस का मार्ग प्राप्त हुआ है, निर्वाण का अन्य कोई मार्ग नहीं है ऐसा निश्चित होता है। अथवा अधिक प्रलाप से बस होओ ! मेरी मति व्यवस्थित हो गई है। निर्वाण का मार्ग बताने वाले और उसे पाने वाले भगवन्तों को नमस्कार हो।

और ऐसा तभी संभव है जब हम आगम के सम्यक् अध्ययन से अपनी अव्यवस्थित मति को व्यवस्थित करें और व्यग्रता को छोड़ एकाग्रता को प्राप्त करें।

टोडरमल स्मारक, अर्हं पाठशाला और इसके प्रयासों से प्रसन्नता की जो लड़ियां प्रस्फुटित होती हैं कि इस पर खुद को वारने को जी चाहता है। बालपोथी, बालबोध के जरिये नन्हें मासूम नौनिहालों को पढ़ा रहे उन छात्र विद्वानों को सिर-आंखों पर बिठाने को जी चाहता है। दिन-रात अनेक तकनीकी प्रबंधकीय कार्यों के जरिये इसे वर्चुअल माध्यम को रियल बनाने में लगे समर्थ कार्यकर्ताओं को सहृदयता के उन्माद से गले लगाने को जी चाहता है और क्या कहें भाई जिन आंधियों में सुविधाओं के बड़े-बड़े आशियां बिखर गये वहां तुमने जो तत्वज्ञान का महल खड़ा किया है वो तुम्हारी जीवटता का प्रमाण है।  आखिर में कभी न खत्म होने वाहे अहसासात को चंद लफ्जों के जरिये पूर्ण करता हूं-

जहाँ आसमां को जिद है बिजलियाँ गिराने की,
हमे भी जिद है वहीं आशियाँ बनाने की,
आँधियों से कोई कह दो अपनी औक़ात में रहे,
क्योंकि अब हमने की है हिम्मत सर उठाने की|
           

-    -अंकुर शास्त्री, भोपाल

Wednesday, July 24, 2019

मन अब भी स्मारक के चैतन्यधाम में रहता है...



कुछ बीत रहा, कुछ रीत रहा है, कुछ थम सा गया है, कुछ अटल सा हो गया है, जीवन अनवरत अपनी ही गति से दौड़ रहा है, हम बदल रहे हैं, सूरतों से, आदतों से, उम्र से, कर्तव्यों-दायित्वों से, भूमिकाओं से। पर मन मेरे जैसे उन सभी विद्यार्थियों को आज भी वहीं पंडित टोडरमल स्मारक के चैतन्यधाम के कमरों में कैद है। जस का तस, बिना परिवर्तित हुए। 2005 का दौर था शायद जिंदगी का सबसे अच्छा साल था वो। पीछे वाले गेट से इस तीर्थ के अंदर पहुंचा था क्योंकि रिक्शा वाला दूसरी ही त्रिमूर्ति ले गया था। 26 जून को वो दिन जहन में इस तरह दर्ज है कि सालों बीतने के बाद भी जस का तस दिखता है।

स्मारक के पांच साल पर लिखा जाए तो इतना है कि न लिख सको न पढ़ सको। कनिष्ठ उपाध्याय में प्रवेश हुआ था, रहने की जगह थी चैतन्यधाम। कुछ चार अलग-अलग छात्रों के साथ कमरा मिला था। वो डबल वाला बैड। अपने हिस्से में ऊपर वाला था। सुबह 5 बजते ही शुरू हुई एक नई जिंदगी। उठते ही लड़ते-झगड़ते साबुनदानी और बॉथरूम के लिए लड़ना। फिर कक्षाओं का दौर। प्रार्थना-पूजा, प्रवचन। कॉलेज, कोचिंग। सब इतना सिस्टमेटिक था कि लगता था कौन कहता है कि संसार में दुख है। सब ठीक ही होता था स्मारक में। अलग-अलग जगहों से आए साथियों से इतनी प्रगाढ़ता हो गई कि वो ऑक्सीजन का काम करने लगे, कुछ तो आज भी प्राणवायु बने हुए है।
पढ़ाई चल रही थी। कक्षाएं चल रही थी। लेकिन जो अदभुत चीज वहां मिली वो था तत्वज्ञान। आदरणीय दादा द्वय, शांति जी, धर्मेन्द्र जी, संजीव जी, प्रवीण जी, पीयूष जी जैसे गुरूओं के समागम से जैसे जीवन में रंग भर गए। बालबोध से शुरू हुआ सफर समयसार तक पहुंचा। गोष्ठियां, छात्र प्रवचन से जो व्यक्तित्व का विकास हुआ वो आज सबसे बड़ी ताकत है हमारी। पहली बार गद्दी पर बैठकर जब प्रवचन करने थे, सामने शांति जी भाईसाहब थे। पांच समवाय पर प्रवचन था। अपने सीनियर्स को देखकर, प्रवचन सुनकर उनकी ही शैली अपनाने की कोशिश थी। मेहनत से विषय की तैयारी की थी। प्रवचन के बाद शांति जी भाईसाहब के कमेंट्स हमेशा सुधार कराते रहे। उसी का परिणाम था कि हम समाज में प्रवचन करने लायक बन पाए।

अनुशासन की पाठशाला जारी थी, वो सब कुछ स्मारक दे रहा था जो किसी के भी उज्जवल भविष्य के लिए जरूरी था। उपाध्याय वरिष्ठ के बाद शास्त्री वर्ग में तत्वज्ञान पढ़ने के साथ ही समझ में आने लगा। पूज्य गुरूदेव की प्रवचन अब अमृत लगने लगे थे। समयसार ही सार नजर आने लगा था। समयसार सप्ताह आज भी याद है, जब सुबह से शाम तक सिर्फ समयसार की ही बातें होती थी। वो दौर ही अदभुत था उसकी कल्पना आज भारी सुकून दे जाती है। हमने सीख लिया था कि तत्वप्रचार और आत्मकल्याण ही ध्येय है। अब दुनिया से खुद को अलग सा महसूस करने लगे थे। चकाचौंध डराने की कोशिश करती थी लेकिन समयसार का तेज सारी कठनाईयों को निस्तेज कर देता था।

प्रवचन हॉल, बाबूभाई हॉल, त्रिमूर्ति जिनालय सब कुछ वैसा का वैसा जहन में है, आज इतने सालों बाद भी लगता है कि बस एक बार इस पवित्र तीर्थ को छू लें बस। भूत होने के बाद शास्त्री भाईयों का वात्सल्य, प्रेम देखकर लगता है कि जो कुछ जीवन में कमाया है वो बेमिसाल पांच में ही कमाया है। पांच सालों में जो कुछ भी सीखा है वो आज भी हर वक्त काम आता है, स्मृतियों के सागर में स्मारक की यादें रत्नों जैसी हैं, जब याद आती हैं, चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है, जो वहां मिला है वो जीवन की अमूल्य निधि है।

खुद को बेहद सौभाग्यशाली मानता हूं कि स्मारक में पढ़ने का मौका मिला। गुरूजनों के आशीष से जीवन को दिशा मिली। तत्वज्ञान मिला जो निरंतर आत्मिक खुराक देता रहा है, प्रेरणा देता है, आत्मकल्याण औऱ तत्वप्रचार की। 2005 से 2019 आ गया है, स्मारक से निकले हुए करीब 9 साल। 2010 में आगे वाले गेट से बाहर गया था अनुपम निधि साथ लेकर। वो आज भी जीवन को गति दे रही है। स्मारक और उसकी यादों के साथ साल दर साल गुजर गए लेकिन इतने सालों बाद भी मन चैतन्यधाम के उसी कमरे में ठहरा हुआ है जहां 27 जून को गया था। अब भी हर दिन मन करता है कि बस उस तीर्थ को छू लू, जी लू दुबारा।

Friday, June 16, 2017

82 वर्षीय 28 वर्ष के युवा : हमारे प्यारे दादा (डॉ हुकुमचंद जी भरिल्ल)

बीतते वक्त की रफ्तार ने हाड़-मांस के इस शरीर को बयासी वर्ष का कर दिया, लेकिन मनोबल, आत्मिक उत्साह और मां जिनवाणी की सेवा के लिए सतत सक्रियता उम्र की इस हकीकत को झुठलाती है। गोया ये कहना होगा कि दादा की उम्र भले लिखी देवनागरी लिपि में '82' जाए; लेकिन इसे पढ़ा अरबी भाषा में '28' जाये। जीवन के बयासी वर्ष वर्ष पूरे करने और तेरासीवे वर्ष में प्रवेश करने पर भी विद्वत्ता की धार पुरजोर कायम है। आत्मबल और आगमबल की बेजोड़ संधि दादा में देखी जा सकती है।

जीवन के संध्याकाल में उनके तमाम जीवन के चित्र आईने की तरह सामने घूमते होंगे। मानो गुजरा हुआ वक़्त कभी एक टीस तो कभी उत्साह का संचार करता होगा। जिसमे उन्होंने कई उतार-चढाव देखें हैं। इस सफलतम जीवन की तह में एक लंबा संघर्ष हिलोरें ले रहा है। हर मुसीबत ने उन्हें सोने की तरह निखारा है। हर एक आलोचना, विरोध उनकी मजबूती का आधार बनी है। बाधाओं ने उनके संकल्प को दृढ़ बनाने का काम किया है।

जैनदर्शन की सेवा और तत्वप्रचार का ये संकल्प आज भी जवान है, भले ही उम्र ढल चुकी है। उनका यही संकल्प उन्हें अपने क्षेत्र का शीर्षस्थ पुरूष साबित करता है। अपने काल का महापुरुष बनाता है। जिस काम को करते हुए उन्होंने जीवन समर्पित किया, उस काम को करते हुए उन्होंने नही सोचा था कि इसके लिए वे विभिन्न अलंकरणों से सम्मानित होंगे या उनके जन्मदिवस को किसी संकल्प दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। सम्मान या यश की चाह से किए गए कृत्यों की सफलता सुनिश्चित नही होती। दादा को जब भी कभी सम्मानित किया जाता है तो अपने सम्मान समारोहों के दरमियाँ वे कई बार कहते हैं- 'ये किसी व्यक्ति का नही विद्वत्ता का सम्मान है। उस परम्परा, उस पीढ़ी का सम्मान है जो तत्वप्रचार में अपना जीवन समर्पित करती है। जिस दिन विद्वानों का सम्मान बंद हो जाएगा उस दिन विद्वान् बनना बंद हो जाएँगे।'

जीवन में प्राप्त प्रचुर यश के अवसर पर भी दादा अपने गुरु पूज्य कानजी स्वामी को याद कर एक सुशिष्य होने का फ़र्ज़ अक्सर अदा करते हैं। गुरुदेव के समक्ष लिए उस तत्वप्रचार के प्रण को हमेशा याद करते हैं जो गुरुदेव की चिता के समक्ष कभी उन्होंने लिया था और यही संकल्प से जीवन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा हर स्नातक को देते हैं।

डॉ भरिल्ल प्रतिभा संपन्न, विद्वान् तो पहले भी थे पर गुरुदेव का समागम मिलने पर उन्हें एक दृष्टि मिली जो समाजोपयोगी साबित हुई। वास्तव में, प्रतिभा से ज्यादा नज़रिए का मूल्य होता है। प्रतिभा जन्मजात हो सकती है पर नजरिया माहौल और खासतौर पे एक गुरु से मिलता है। समाज का, राष्ट्र का विध्वंश करने वाले लोग भी प्रतिभाशाली होते हैं, चाहे हिटलर नेपोलियन हों या ओसामा, राज ठाकरे ये सभी प्रतिभा सम्पन्न लोग नजरिये के मिथ्याचरण के कारन ऐसे रहे हैं। इसलिए अच्छे गुरु और सत्संग का मिलना सौभाग्य की बात है। इसी कारन दादा अपने गुरु को हमेशा याद कर उस उपकार के प्रति कृतज्ञता जताते हैं। दादा को गुरुदेव मिले, और हमें दादा...वास्तव में तत्वज्ञान के अविरल प्रवाह में अपने ईमानदार योगदान से ही हम अपने गुरु के उपकार को कुछ हद तक चुका सकते हैं

दादा तत्वप्रचार की संकल्पना पानी की पतली धार की तरह करने की बात करते हैं। पानी की मोटी धार में पानी तो तेज़ आता है पर बहाव ख़त्म होने पर तलहटी सुखी रहती है। जबकि पतली धार पहले ख़ुद पानी सोखती है फ़िर पानी आगे बढ़ाती है। ऐसे ही डॉ साहब ने पहले ख़ुद शास्त्रज्ञान को पिया है फ़िर प्रचार के मध्यम से इसे आगे बढाया है।

उनका शास्त्रज्ञान जीवन के इस संध्याकाल में उन्हें आत्ममूल्यांकन का साधन भी प्रदान करेगा। जीवन की इस विदाई बेला को देखने का महापुरुषों का नजरिया निश्चित तौर पर आम आदमी से अलग होता होगा क्योंकि उसे अपने संघर्ष के दौर और सफलता के आयामों को एक साथ देखना है। हमारे प्यारे दादा को अपने इस संध्याकाल में सफलता के प्रतिमानों के साथ संघर्षों के दौर की जुगाली भी होती होगी। एक तरफ़ विदेश में तत्वप्रचार के लिए जाने वाली हवाई उड़ाने होंगी तो दूसरी तरफ़ वो दौर भी होगा जब साईकिल से प्रवचन के लिये मीलों जाया करते थे। एक तरफ़ अनेकों उपाधियाँ और सम्मान समारोह होंगे तो एक तरफ़ वे पल भी होंगे जब जिनवाणी रथयात्रा के दौरान सीने पर लाठियां झेली थी। जिस बुद्धि ने क्रमबद्ध-पर्याय, नयचक्र और धर्म के दशलक्षण जैसी कृतियों की रचना की है वह बुद्धि कई बार विरोध का शिकार हुई है। उनका विरोध करने वालों की नज़र उनके व्यक्तिगत जीवन पर तो रहती है पर उनके अविस्मरनीय योगदान पर नही।

उनके इसी योगदान के कारन उन्हें महापुरुष कहने में अतिश्योक्ति नज़र नही आती। जिन मानकों के आधार पर उनका सम्मान किया जाता है वे मानक उन्हें महापुरुष सिद्ध करते हैं। हालाँकि ये सच है की हर चीज के मानक एक से नही होते, जिन मानकों के आधार पर सचिन तेंदुलकर,अमिताभ बच्चन को ये दुनिया महापुरुष मानती है, गाँधी,विवेकानंद को महापुरुष कहने वाले मानक उससे अलग हैं। राम, बुद्ध, महावीर को महापुरुष कहने वाले मानक उनसे भी अलग है। इसी तरह जिन आयामों से मैं छोटे दादा को देख रहा हूँ, या हमारा हर स्नातक, तत्वरसिक मुमुक्षु समाज उन्हें देखता है वे उन्हें महापुरुष साबित करने के लिए पर्याप्त है।

टोडरमल स्मारक की स्थापना और वहां से निकली करीब हज़ार विद्यार्थियों की फ़ौज साथ ही परवर्ती कई समानांतर संस्थाओं से निकल रहे तत्वप्रभावकों की सेना दादा के प्रयासों को और आगे बढ़ाएगी। दादा के प्रयासों से पूज्य गुरुदेव द्वारा जगाई क्रांति निश्चित ही एक विस्फोट में तब्दील हुई है और मैं दादा को विश्वास दिलाता हूं की ये विस्फोट ज्वालामुखी की तरह अविरत ज्वलंत बनाये रखने का काम आपकी ये शिष्य परंपरा करेगी।

 गुरुदेव ने डॉ भारिल्ल को दृष्टि दी थी आज हमारे पास जो दृष्टि है वो आपसे गृहीत है। आपसे मिली दृष्टि के ज़रिये जन-जन तक तत्वप्रचार करके ही गुरुदाक्षिणा चुकाई जा सकती है। फिलहाल तो आपसे उद्धृत ज्ञान में भीगने का काम ही जारी है।

अंत में उन पंक्तियों को याद करूँगा जो मैंने अपने टोडरमल स्मारक के विदाई समारोह में कही थी कि...

ये वो मेघ हैं जो ज्ञान की वर्षा सदा करते,
ये बरसे (जब भी, जितना भी बरसे) तो नहा लेना ये बादल जाने वालें हैं।

-अंकुर शास्त्री, भोपाल