हमारा स्मारक : एक परिचय

श्री टोडरमल जैन सिद्धांत महाविद्यालय जैन धर्म के महान पंडित टोडरमल जी की स्मृति में संचालित एक प्रसिद्द जैन महाविद्यालय है। जिसकी स्थापना वर्ष-१९७७ में गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की प्रेरणा और सेठ पूरनचंदजी के अथक प्रयासों से राजस्थान की राजधानी एवं टोडरमल जी की कर्मस्थली जयपुर में हुई थी। अब तक यहाँ से 36 बैच (लगभग 850 विद्यार्थी) अध्ययन करके निकल चुके हैं। यहाँ जैनदर्शन के अध्यापन के साथ-साथ स्नातक पर्यंत लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था है। आज हमारा ये विद्यालय देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। हमारे स्मारक के विद्यार्थी आज बड़े-बड़े शासकीय एवं गैर-शासकीय पदों पर विराजमान हैं...और वहां रहकर भी तत्वप्रचार के कार्य में निरंतर संलग्न हैं। विशेष जानकारी के लिए एक बार अवश्य टोडरमल स्मारक का दौरा करें। हमारा पता- पंडित टोडरमल स्मारक भवन, a-4 बापूनगर, जयपुर (राज.) 302015

Friday, December 2, 2016

ज़ेहन में दबी सुप्त संचेतनाओं पर पानी के छीटें : सम्मेद शिखर स्वर्णजयंती महोत्सव


बिखराव पैदा, रिश्तों का रेशा वक़्त के बीतने के साथ ही महीन पड़ता जाता है। दूरियां, पहले यादों को धुंधला करती हैं फिर अहसासों को भी। मसलन, नजदीकियों के दरमियाँ आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती लगातार दूरियां, हमें गुजिश्ता तमाम रिश्तों के प्रति असहिष्णु और असंवेदनशील बना देती हैं। संबंधों का तार नये जहाँ और नए हालातों से खुद ब खुद जुड़ जाता है। कतरा-कतरा हम भूल जाते हैं उसी नींव के पत्थर को, जिस पर टिकी होती है हमारी जिंदगी की इमारत। सो जाती है सारी संचेतनायें, जो कभी हमें हम से भी प्यारी हुआ करती थीं।

बदलाव की बयार बहुत कुछ बहा ले जाती है...बहुत कुछ ऐसा भी जो रहना चाहिए था ताउम्र हमारे साथ। बहुत कुछ ऐसा जो करता है हमें जमाने से अलग। बहुत कुछ जो जोड़ता है हमें एक दूसरे से बिना किसी स्वार्थ के। ऐसे में एक-दूसरे से बने रहना लगातार दूर...इस खाई को और गहरा ही बनाता है। तब जरुरत होती है एक मिलन की..जो जगा दे हममें हमारा अक्स। जो करदे जिन्दा उसी उन्माद को जो कभी रहा करता था हमारे साथ। जिस मिलन से एक बार फिर हम कर सके बीते लम्हों की जुगाली। जाग उठे प्यार, अपनापन वैसा ही एक दूसरे के लिए...जो असल में ताकत है हमारी।

हो सकता है अपनी जिंदगी की कसमकस में उलझे हुए, बेचैन हसरतों को पूरा करने में अलग हों रास्ते हमारे। हो सकता है अपना कोई अलग वतन तलाशने में उन रास्तों के पड़ाव भी अलग हों। पर उन रास्तों के पार नज़र आने वाली मंज़िल..हमारा अंतिम गंतव्य नहीं है। जो अंतिम है वो हम सबका एक है। ज्ञानतीर्थ से सिंचित हो असल में तो हम वहां ही पहुंचना चाहते हैं जिसके आगे कोई राह ही नहीं है। तो जब हैं हम पथिक उस एक मोक्षमार्ग के, तो फिर ये अलगाव कैसा। क्यों तात्कालिक के मोहपाश में सर्वकालिक को विस्मृत करना। क्यों सोना। क्यों खोना। क्यों होना, उनसे दूर जो बन सकते हैं जरिया हमें हमसे मिलाने का।

समयसार विधान। तीर्थराज सम्मेदशिखर। स्वर्णजयंती महोत्सव। दरअसल इन तमाम सुप्त संवेदनाओं को झंकृत करने का एक अहम् प्रयास था...जो अपने इस उद्देश्य में दो सौ फीसद सफल हुआ है। निर्वाण धरा पर, हमारी निर्माण स्थली का आयोजन...एक बारगी फिर हममें से कई के पुनर्निर्माण का जरिया बन उठा। जहाँ से फिर जागी हममें वही चिंगारी, जिसे संजोये हम बिताते थे खुशनुमा पल अपनी निर्माण धरा पर।

 'न भूतो न भविष्यति' कहकर मैं आयोजन की बाहरी भव्यता के प्रति कोई अतिरेक पूर्ण बात नहीं कहूंगा। क्योंकि इससे अधिक भव्यता रही भी है, और आगे के आयोजनों में देखने को मिलेगी भी। इस आयोजन में कोई खामियां न रही हो ऐसा भी नहीं है, वास्तव में इतने बड़े प्रयासों का आकलन उन ऊपरी कमियों से नहीं बल्कि उद्देश्यों से किया जाना चाहिए। और जिन उद्देश्यों को लेकर हम जुड़े थे या जिस आंतरिक प्रेरणा ने हमे इस आयोजन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया था उस मंशा पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़े किये जा सकते।

बहरहाल, इस तरह के आयोजन वर्तमान और भविष्य दोनों की दरकार हैं क्योंकि हमारा परिवार अब इतना बढ़ गया है कि हमारे बीच रहने वाली भौतिक दुरी, हमारी भावनात्मक दुरी की भी वजह बन जाती है। 'नज़र से दूर, दिल से दूर' उक्ति पुरानी है पर चरितार्थ हमेशा होती है। इसलिए अच्छा है कि एक दूसरे की नजरों में बने रहे, तो दिल में भी बने रहेंगे। और हमारे इस तरह के मिलन से राख के भीतर दबी चिंगारी को भी हवा मिलती रहेगी।

खैर, कहते-कहते बहुत कुछ कह गया। पर फिर भी काफी कुछ अब भी अनकहा ही रह गया। पर चूँकि हम एक-दूसरे से जज़्बाती तौर पर बंधे हैं तो अल्फ़ाज़ों के पीछे के अहसासों को पढ़ना भी जानते हैं..इसलिए गुजारिश है आपसे इन शब्दों को नहीं, शब्दों की राख के पीछे छुपी जीवंत आग को समझने की कोशिश करियेगा।

Tuesday, November 22, 2016

Tuesday, August 30, 2016

ज्ञानतीर्थ के स्वर्णजयंती वर्ष के बहाने।

कुछ भी आगे लिखने से पहले कुछ सवालों से अपनी बात शुरु करना चाहूंगा..सवाल है कि रेगिस्तान में दूर किसी किनारे पर खड़े वृक्ष की क्या अहमियत है? घनघोर तिमिर में डूबे किसी वन में दीपक की क्या अहमियत है? काल के गाल में समा रहे किसी कई दिनों के प्यासे व्यक्ति के लिये जलबिन्दु की क्या अहमियत हैं? जैसे इन तमाम चीज़ों की कीमत जानते हुए भी बयां करने में हम असमर्थ हैं और इनके बारे में कुछ कहकर जो भी हमा बयां कर दें पर उतना मात्र कहा हुआ कभी भी इनकी असल अहमियत को ज़ाहिर नहीं कर सकेगा। कुछ चीज़ें बस महसूस की जा सकती है उन अनुभूत चीज़ों के बारे में मन में वर्तने वाली श्रद्धा ही उनका असल सम्मान है अल्फाजों के तमाम नगीने भी ऐसी चीज़ों, परिस्थितियों या व्यक्तियों के सम्मान को प्रदर्शित नहीं कर सकते।

टोडरमल स्मारक। यहां से संबद्ध हर व्यक्ति मात्र के लिये कुछ ऐसी ही श्रद्धा का विषय है कुछ लफ्जों में समेट इसके महिमा प्रदर्शन का कार्य अनंत को संख्या में समेटने की गुस्ताख़ी है। पर चुंकि स्वर्ण जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहे इस परिसर की महिमा में कुछ कह देने की औपचारिकता निभाना आवश्यक है तो बस दिल को रखने के लिये कुछ कह देने का उपक्रम कर रहा हूँ। पर ये जानता हूँ कि मेरा तमाम शब्द चातुर्य कम से कम इस विषय में आकर तो असफल होगा ही। क्योंकि यहाँ दुविधा ये होगी कि क्या भूलूं या क्या याद करूं और जो भी याद करुं उसकी शुरुआत कहाँ से करुं।

फिर भी शुरु करता हूँ। वर्ष 2002। कक्षा दस में अध्ययन के दौरान ही कानों में ये सुगबुगाहट शुरु हो गई थी कि आगे पढ़ने के लिये टोडरमल स्मारक में जाना है। उससे पहले तक इस भवन से नाता बस बालबोध-वीतराग विज्ञान के पहले पृष्ठ पर प्रकाशक के नाम पर छपे कुछ शब्दों के तौर पर ही था। लेकिन उन बालबोध और वीतराग विज्ञान के जरिये ही इस भवन की छवि किसी भव्य ज्ञान तीर्थ के रूप में दिलोदिमाग में अंकित थी ये बात अलग है तब तक हम ज्ञानतीर्थ शब्द की व्याख्या करने में समर्थ बुद्धि के धारक नहीं थे। ये कुछ कुछ वैसा ही था जैसे एनसीआरटी या माध्यमिक शिक्षा मंडल की किताबों के पीछे छपे इनके नाम इन परीक्षा बोर्डों के प्रति एक अलग ही कौतुलह पैदा करते हैं वैसा ही कौतुहल उस बालमन में पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट को लेकर था। लेकिन जब 2002 के उस वर्ष में मुझे इस परिसर में जाने का अवसर आया तो स्वभावतः अपने घर और गांव का प्रेम भला कैसे अपनी पगडंडी छोड़कर आगे बढ़ने की इज़ाजत दे देता।

पर कहें कि भली होनहार थी सो लाख घर पर रुकने की कोशिशों के बावजूद भी टोडरमल स्मारक में अगले पांच साल बिताने का सुअवसर हाथ लगा। ये पांच साल, ज़िंदगी के अगले संभावित पचास सालों की आधारशिला रखने को तैयार थे। एक मजबूत आधार शिला। जहाँ सिर्फ संस्कारों का आधार ही नहीं बल्कि तत्वज्ञान के पंख भी हमें मिलने जा रहे थे जिनके सहारे हम इस भव और भवांतरों के भी समंदर को पार करने का साहस रख सकते थे...आत्मविश्वास से संपन्न हो ये साहस कर भी रहे हैं। हां कुछ विसंगतियां अभी भी होंगी जीवन में, किंतु वे निश्चित ही उन संभावित विसंगतियों से कम होंगी जो तब पैदा होती जब हम टोडरमल स्मारक न गये होते। 

टोडरमल स्मारक स्वर्णजयंती वर्ष पर प्रकाशित होने वाली स्मारिका में प्रकाशन हेतु मांगे गये लेख में एक बिंदु है संस्था का समाजहित में योगदान। मैं प्राधिकृत आंकड़ों के आधार पर नहीं बता सकता कि इस व्यापक समाज में टोडरमल स्मारक अपने प्रयासों से क्या योगदान दे रहा है उस निराकार समष्टि को साकार कर प्रस्तुत भी नहीं किया जा सकता। लेकिन कहते हैं व्यष्टि (व्यक्ति) ही समष्टि (समाज) की रचना करता है। किसी भी भले प्रयास को आयाम देते वक्त समष्टि का नहीं व्यष्टि का ही विचार किया जाता है और टोडरमल स्मारक के प्रयासों का समस्त केन्द्रीकरण व्यष्टि के हित में ही रहा है। जी हाँ पांच साल तक एक ऐसे अबोध बालक का निर्माण जो तमाम  दुनियादारी या हित-अहित के विचार से परे बस एक बालक है लेकिन जब वो यहाँ से निकलता है तब स्वयं तो एक आधार स्तंभ बनता ही है साथ ही जहाँ भी वो खड़ा होता है वहीं एक संस्था का काम करता है। अपने आसपास स्थित समस्त परिसर को गुलजार करता है। इस तरह देखें तो एक व्यष्टि का हित ही अंततोगत्वा समाज का हित बन जाता है। इससे पैदा हुए सकारात्मक बदलाव का जो भी हम आकलन करते हैं वो असल से बहुत कम ही होता है। क्योंकि एक स्नातक अपने गुणों की गंध सिर्फ अपने परिवार, जाति या वर्ग विशेष तक ही नहीं फैलाता बल्कि वो धर्म और समाज के इतर भी लोगों में अपने संस्कार और ज्ञान की सौरभ पहुंचाता है।

बात यदि संस्था की कार्यप्रणाली की करुं तो कहना चाहुंगा कि कोई भी प्रणाली या व्यवस्थाएं सफलता का आधार नहीं होती बल्कि उद्देश्य ही सफलता के सुनिश्चितिकरण का आधार होते हैं। आपके उद्देश्य यदि महान हैं तो व्यवस्था की खामियों के बावजूद आप अपने लक्ष्य की उपलब्धि करने में सक्षम होते हैं किंतु यदि उद्देश्यों में ही छल है तो दुरुस्त व्यवस्थाएं भी गंतव्य तक पहुंचाने में सक्षम नहीं है। टोडरमल स्मारक का बीते पचास साल का इतिहास स्वयं इसकी प्रणाली की कहानी बयां करता है। करीब एक हजार विद्वानों की फौज, व्यापक तत्व प्रचार की सुदृढ़ परंपरा, जन-जन तक सत्साहित्य की पहुंच सुनिश्चित करने में यकीनन संस्था की कार्यप्रणाली का हाथ नहीं हो सकता बल्कि उन उद्देश्यों का हाथ हैं जिनको लेकर संस्था काम करती है। पचास साल की इस यशस्वी परंपरा को अगले पचास साल और कहें कि अगले पांच सौ साल या इसके परे भी ले जाना है तो उन महान् उद्देश्यों के साथ समझौता नहीं करना है जिनका आधार पूज्य गुरुदेव श्री और आदरणीय छोटे दादा के द्वारा रखा गया है। इन उद्देश्यों के सहारे चाहे किसी भी प्रणाली का लिबास क्युं न हों उसका सफल होना तय है।

टोडरमल स्मारक और जैनतत्वज्ञान के शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की बात करें तो आज समाज में संचालित दर्जन भर से ज्यादा संस्थाएं टोडरमल स्मारक की सफलता की गवाही दे रही हैं। यदि इस क्षेत्र में टोडरमल स्मारक का योगदान नगण्य होता तो निश्चित ही खुद टोडरमल स्मारक महाविद्यालय ही काल के प्रवाह में कहीं खो गया होता लेकिन ये तो दोगुनी शक्ति से बढ़ ही रहा है साथ ही कई अन्य को भी इस जैसा बनने के लिये प्रेरित कर रहा है। ये प्रतिस्पर्धा अच्छी है हम तो चाहेंगे सब टोडरमल स्मारक जैसा बनना चाहें बल्कि इससे भी आगे निकलने का प्रयास करें क्यों कि इन प्रयासों से अंततः जिनशासन को ही गति मिलेगी। लेकिन प्रतिस्पर्धा के बीच आलोचना के सुर तेज करना समझ से परे हैं। ये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहीं बाजारु न हो जाये इसका ध्यान रखना जरुरी है क्योंकि ये समझ लें कि भले ही कोई नई संस्था टोडरमल स्मारक से ज्यादा ऊंचाई हासिल कर ले लेकिन टोडरमल स्मारक जितनी गहराई पा लेना आसान काम नहीं है। आज विरोधी संस्थाओं के बीच भी जो खुद को बेहतर बनाने की होड़ है वो भी टोडरमल स्मारक की ही देन हैं। इस तरह यदि मैं कहूं कि तमाम क्रियाकांड के बीच शिक्षा के क्षेत्र में जितना भी जैन तत्वज्ञान विद्यमान है वो सिर्फ और सिर्फ टोडरमल स्मारक की वजह से है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

इन सबके बावजूद बेशक हम खुद की बीते सालों की उपलब्धियों से नई ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त करें किंतु इन गुजरे वर्षों की सफलता के व्यामोह में अंधा हमें नहीं होना है। इस धारा को अक्षुण्ण रखना है तो गुजरे वक्त से ज्यादा अपने वर्तमान और भविष्य पर नजर रखना है। अपने उद्देश्यों में किसी भी भांति कलुषता नहीं आने देना है। पद, प्रतिष्ठा और पैसे का वर्चस्व कम से कम हमारी इस मातृ संस्था में तो न रहे। परस्पर साधर्मी वात्सल्य और सरलता से सहयोगी वृत्ति बनाये रखें। राजनीति और छल का प्रवेश यहाँ न होने पाये इसके लिये समग्र प्रयासों की जरुरत है। आलोचना और अपनी निंदा को भी सुने तथा उसे अंतर्मन से गुने भी, यदि आलोचना सही है तो उन गलतियों को सुधारें। और यदि आलोचना निरर्थक है तब भी आलोचना करने वाले पर द्वेष या वैमनस्य न बरतें। हमें सहिष्णु भी होना है और साहसी भी। प्रतिकार करें, प्रतिस्पर्धा भी करें पर प्रतिद्वंदी किसी के भी न बने। सफलता में प्रसन्न हों किंतु असफलता में खेदखिन्न नहीं। थोड़ा ही सही पर अपने अपने स्तर पर प्रयास जरुर करें क्योंकि हम सब द्वारा थोड़े-थोड़े अंशों में सींचे गये जल से ही इस बोधिवृक्ष का पल्लवन बरकरार रहेगा। मेरा अपने हर शास्त्री भाई से निवेदन है कि टोडरमल स्मारक के स्वर्णिम अतीत ने हमारा वर्तमान गढ़ा है अब हमारे वर्तमान का ये फर्ज है कि हम इसका भविष्य यशस्वी और जीवंत बनायें।
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Wednesday, July 20, 2016

समाधि का साधक - 1

(यह श्रृंख्ला किसी भी विद्वेष पूर्ण भावना अथवा किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य कर नहीं लिखी गई है...अध्यात्म सीखने की शुरुआती कड़ी में स्वयं के मन में व्याप्त धारणा और धर्म की आडंबरपूर्ण छवि को लेकर ही ये व्यंग्य है। शैली व्यंग्यात्मक होने पर भी, इस लेखमाला में छुपे कई सवाल बेहद जटिल है। इस श्रंख्ला को व्यष्टि केन्द्रित न मान समष्टि में ही आरोपित करें। और असल में तो ये व्यक्ति पर नहीं, प्रवृति पर व्यंग्य है। लेखमाला के पात्र एवं घटनाएं काल्पनिक हैं जिनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है यदि कोई संबंध पाया जाता है तो यह महज एक संयोग है...............)

और फिर श्वांस पर ध्यान केन्द्रित करने के घंटे भर के उपक्रम के बाद आखिर फुलेलानंद ने अपना ध्यान भंग किया। ध्यान की उस समूची प्रक्रिया से निवृत्त होने के बाद वो अपने में किसी दिव्य रोशनी का अनुभव कर रहा था और ज़ाहिर है कि जब एक तरफ चमक महसूस हो रही हो तो जमाने भर में तो अंधकार नजर आयेगा ही। बस ऐसी ही स्थिति से गुजरता हुआ वो पूरी दुनिया को हिकारत भरी निगाहों से देख रहा था। पास से कुछ छात्रों की हंसी ठिटोली करती टोली गुजरी तो श्रेष्ठता के व्यामोह से भस्मीभूत फुलेलानंद ने कुछ ऐसे चेहरे के भाव व्यक्त किये मानो किसी भंगी ने पूजाघर में दस्तक दे दी हो। 

"सब, नामुराद अपने जीवन को स्वाहा किये हुए हैं"। लड़कों के कुछ पीछे गुजरते ही फुलेलानंद के सुर फूट पड़े। चुंकि आज उसने किसी पर्व विशेष का इकैत रखा हुआ है तो एक ही टाइम खाना खाने के विचार से घड़ी में दो बजने का इंतजार कर रहा है। इस विशेष समय पर भोजन लेने के पीेछे उसका अपना ही अलग तर्क है वो कहता है कि मध्यान्ह में भोजन लेने से दो बार का अर्धदिवस में किये तप का फल मिलता है। इससे आप सुबह भी वेदना सहकर तप करते हैं और संध्याकाल में भी। साथ ही मध्यान्ह भोजन के चलते अर्धरात्रि में क्षुधा के विकल्प भी अपेक्षाकृत कम सताते हैं और चिंतन, ध्यान में मन लगा रहता है।

फुलेलानंद। यूं तो शुरुआत से ही धर्म-अध्यात्म के प्रति आकृष्ट थे किंतु इसका असली चस्का उन्हें तब चढ़ा जब पैंतीस की उम्र तक कहीं विवाह की बात न बनने और घर-परिवार के सदस्य जनों द्वारा उपेक्षित बर्ताव करने से उन्होंने कई विद्वतजनों की वैराग्यबोधक रचनाओं का स्मरण कर दुनिया-जमाने को कोसते हुए पूर्णकालिक सन्यास के मार्ग पर चलने की ठान ली। शुरुआत में समाज के कुछ वरिष्ठ तपस्वियों से प्रेरित हो वे कुछ स्थानों पर भजन-कीर्तन या पाठ के लिये जाया करते थे लिहाजा त्यागी-तपस्वियों के ग्लैमर से भलीभांति परिचित थे और समाज द्वारा किये जाने वाले इस सम्मान को वो धर्म का, पुण्य का अथवा त्याग का फल बताया करते थे। इस तरह त्याग की अपरंपार महिमा का तो पहले से उन्हें बोध था किंतु राग की किंचित परवशता के कारण घर-परिवार छोड़ने का योग नहीं बन रहा था। 

सो जब उपेक्षा की कड़ियां जटिल हो गईं, विरोधी सुर मुखर हो गये, सजातीय सम्मान विला गया तो फुलवारी प्रसाद भी फुलेलानंद में समा गया। जी हाँ, महाराज फुलेलानंद का इस सन्यास से पहले यही नाम था फूलवारी प्रसाद। नाम बड़ा होने के चलते गांव के लोग शार्टफार्म में ओ फुलवा..ओ फुलवा कहा करते थे। पूर्व नाम की इस सार्थकता के महत्व को फुलवा के दीक्षागुरु ने भी समझा और फुलवा के आगे आनंद जोड़कर उसे फुलेलानंद बना दिया। इस नवीन नाम का महत्व बताते हुए गुरुजी ने कहा था कि जैसे समस्त परसंयोग से दूर चैतन्य सिर्फ अपने आनंद से ही फूलती है और इसके विस्मरण से ही सिकुड़ती है ऐसे ही तुम भी बस ज्ञान-ध्यान और तप में आरक्त रहकर सदा फुलेलानंद बने रहना। 

गुरुदेव ने अपने वचनों को विस्तार देते हुए कहा- "हे फुलेल! दरअसल तुम स्वयं की महक से एक फूल की तरह ही हो। जैसे कांटों से घिरा फूल अपनी महक से सदैव सुरभित रहता है बस तुम भी ऐसे ही सदा अपनी ज्ञान सौरभ से महकते रहना।" गुरु के इन वचनों को सुन फुलेल फूल के डबल हो गये थे...उस वक्त। तो इस तरह फुलवारी प्रसाद से फूलेलानंद तक की इस लघुयात्रा का जन्म हुआ। तकरीबन पांच वर्ष ही हुए होंगे फुलेलानंद को और इतने कम समय में ही उन्होंने अपने आप को समाज में भलीभांति स्टेबलिश कर लिया। अब कई गांवों से वार्षिक आवास के लिये फुलेलानंद के पास आमंत्रण आते थे...श्रद्धालुओं की वेटिंग लगी रहती थी उनके दर्शन के लिये। और पर्युुषण, अष्टान्हिका जैसे पर्वों में दान के महत्व को बताते हुए अपने एक निर्माणाधीन तीर्थ के लिये चंदा भी अच्छा खासा इकट्ठा हो गया था...और लगातार हो रहा था।

तो उस रोज़ फुलेलानंद को करीब दो बजे अपने उस भक्त के यहां से आमंत्रण पहुंचा.....जिनके यहाँ उनकी आहारचर्या होनी थी। जी हाँ...हालांकि मैंने शुरआत में आहारचर्या को भोजन कहकर फुलेल जी की तौहीन की थी उसके लिये मैं क्षमा चाहता हूँ किंतु असल में फुलेल जी भोजन नहीं आहार करते थे। यद्यपि वे मुनि तो नहीं हुए थे किंतु साधुवत् ही पूजे जाते थे...ये विरासत उन्हें अपने समस्त परापर गुरुओं से प्राप्त हुई थी। वे साधु थे तो ये भी साधु थे, वे आहार करते थे तो ये भी आहार करते थे, वे महाराज थे तो स्वाभाविक है ये भी महाराज थे। इस पूरी परिपाटी में फुलेल महाराज का कुछ भी कर्त्तव न समझा जाये। दरअसल वे खुद को समाधि का साधक कहा करते थे और इसी वजह से वे अपने को साधुओं की श्रेणी में मानते थे कि जैसे साधु आधि-व्याधि-उपाधि से रहित समाधि के साधक हैं बस वैसी ही साधना में फुलेल जी भी रत हैं।

आमंत्रण कर्ता ने बड़े विनीत भाव से फुलेलजी की आगवानी की और उन्हें आहारचर्या के लिये ले गये। चर्या पर जाते वक्त फुलेल जी के चेहरे की निस्पृहता बड़ी आसानी से पढ़ी जा सकती थी और अपने उस भक्त पर आशीष की अनंत झड़ियां फुलेल महाराज के रोम रोम से झड़ रही थीं। श्रद्धालु भी अपने को कृतार्थ जानता हुआ शताधिक बार मस्तक झुकाये उनको लिये जा रहा था...महाराज फुलेल की दिव्य आभा चेहरे पर समां नहीं रही थी...रास्ते भर वे उस आभा को आते-जाते लोगों पर बिखेरते जा रहे थे...इस आभा बिखेरीकरण अभियान में उनका हाथ अनायास ही आशीर्वाद की मुद्रा में बना हुआ था। साथ में उनके एक स्टील की डोलची थी जिसका भार अत्याधिक जानकर उनके भक्त ने उसे अपने हाथों में ले लिया था। इस तरह महाराज फुलेल के पास इस वक्त  पूरी दुनिया को देने के लिये सिर्फ आशीर्वाद ही था जिसके भार से वे इस कदर दबे जा रहे थे कि वे उसे भी आशीर्वाद दे रहे थे जो उनकी ओर निगाह भी नहीं डाल रहा था। अब भाई यही तथाता पुरुषों की निशानी होती है कि वे पूजने, न पूजने वाले सभी को एक ही नजर से देखते हैं और सभी पर मुक्त हस्त से आशीर्वाद बिखेरते चले जाते हैं।

रास्ते की दूरी नापकर आखिर महाराज का प्रवेश उस घर में हुआ जहाँ उनकी आहारचर्या संपन्न होनी थी.....प्रवेश से पूर्व ही जच्चा-बच्चा से लेकर कक्का-चच्चा तक उनके पड़गाहन में संलग्न हो गये। परिवार के सभी सदस्यों को सख्त हिदायत दी गई थीं कि महाराज के आते ही स्वागत में कैसे लोट जाना है...और सब लोट भी गये थे। उस घर में हाल के पैदा हुए बच्चों को अंडरग्राउंड कर दिया गया था क्योंकि परिजनोें को डर था कि बच्चे के स्वाभाविक रुदन को सुन कहीं महाराज के भोज में अंतराय न पड़ जाये...हालांकि ऐसा कभी हुआ नहीं था पर फिर भी डर सबको लगा रहता था। उस घर के हाल के पैदा हुए बच्चों को छोड़ सभी पूरी तरह सचेत थे यही वजह है कि होशवालों को नहीं छुपाया गया था बाकि सब अंडरग्राउंड थे। होशवालों को तो आगे-आगे कर महाराज की परसवाई के काम में लगाया गया था। घर के दद्दाजी और अम्मा जी..अपने नौनिहाल पोता-पोती को संबोधते हुए कहते थे "अरे जरा, गुड्डु खों बदाम देन दो"। 

इस तरह से घर-परिवार के लगभग चवालीस-पैंतालीस सदस्य (जिनमें दूर के फूफा-फूफी, ताऊ-ताई भी सम्मिलित हैं) ने बारी-बारी से महाराज को आहार परोसा और अपने नरभव को धन्य किया। महाराज ने भी सबकी भावनाओं का पूरा ख़याल रखते हुए किसी को भी इस पुण्य से वंचित न रहने दिया। इस तरह महाराज ने महज एक लीटर दूध, दस-बारह ठो बादाम-काजू-पिस्ता वगैरा। आठ-नौ रोटी, पांच-सात सब्जियों से खाकर अपने अल्पभोजी होने का प्रमाण पेश किया। उनके इस अल्पभोजन का ग़म पूरे परिवार ने मिलकर मनाया.......और देर रात तक घर की अम्मा चिल्लाती रहीं- "मराहाज तो कछु खात ई नई यां"। दद्दा भी चिल्लाये जा रये थे "एक तो एक टैम खाने और ओई पे छटांक भर खाना में कैसे जीवन चलत हुईये मराज को"। फुलेलानंद जी की आहारचर्या के बाद खुशी और ग़म के मिश्रित भाव घर में फैले हुए थे...आहार कराने से प्राप्त आशीष की खुशी थी तो महाराज के अल्पभोजी होने का ग़म भी था............

महाराज फुलेलानंद चुंकि आज ऊनोदर किये हुए थे...एकासन था। तो अल्पशक्ति होने के चलते उन्होंने आज शाम प्रवचन करने के बजाय मौन साधना करने को उपयुक्त समझा। भक्तजन महज उनके दर्शन कर कृतार्थ हो रहे थे और वे ध्यानमग्न चेहरे पर सुकोमल मुस्कान लिये हुए अपने फुलेलानंद होने का प्रमाण पेश कर रहे थे......................


जारी........................

Sunday, April 17, 2016

गुमा एक था....मिल सब गये!!!! (अनायास...प्रसंगवश)

बीते चार दिन स्मारक परिवार के लिये खासी ऊहापोह और चिंता भरे रहे। दरअसल हमारे स्नातक परिवार के एक शास्त्री भाई का अचानक अपने परिचितों से संपर्क टूट जाना...और भांत-भांत की मिथ्या कल्पनाओं और संशयपूर्ण खबरों ने सभी का ध्यान सिर्फ एक विषय पर केन्द्रित कर दिया। माजरा कुछ यूं हुआ कि हर कोई अपने-अपने क्षेत्र में काम करते हुए भी काम नहीं कर रहा था...खाते हुए भी नहीं खा रहा था, सोते हुए भी नहीं सो रहा था। यूं लगा मानो तमाम निगाहें व्हाट्सएप के विविध शास्त्री ग्रुप्स और फेसबुक के वर्चुअल संजाल पर जम गई हों...और ये जमीं हुई निगाहें बस उस एक खबर का इंतजार कर रही हों जो ये जताती हो कि हमारा भाई हमें मिल गया।

मौजूदा दौर में ये घटना बहुत सामान्य है...आये दिन इस तरह की घटनाएं मीडिया की सुर्खिया बनती हैं और वास्तव में उपरोक्त घटना में तो ऐसा कोई भी सेन्सेशनल फैक्टर नहीं था कि ये मेनस्ट्रीम मीडिया के राष्ट्रीय संस्करण में किसी छोटे से कॉलम में भी जगह बना पाये। लेकिन बावजूद इसके, ये घटना उन तमाम मीडिया हेडलाइन्स को झुटला रही थी जो संबंधों के बिखराव को, सामाजिक असंवेदनशीलता को या व्यक्ति में बढ़ती वैयक्तिक वृत्तियों को ज़ाहिर करती हैं। करीब हजार लोगों का एक परिवार..जहाँ न कोई पहला है और न कोई आखिरी। जहाँ किसी प्रकार का आर्थिक, क्षेत्रीय अथवा जातिगत विभाजन नहीं है। जिनका एक 'भाव', एक 'राग' और एक ही 'ताल', है..वास्तव में इनके इस एक्य में ही भा..र और त अर्थात् भारत की एकता निहित है या कहें कि मन, वचन और काय की विरुपताएं जहां सुप्त हो जायें...उसका नाम है स्नातक परिवार। ये पौध यकीनन जयपुर की धरा से पल्लवित हुई थी..लेकिन अब इस बटवृक्ष की छांव में कई सिस्टर संस्थाएँ आसरा ले रही हैं और उस एक्य को ही आगे बढ़ा रही हैं।

अपने एक गुमे हुए शास्त्री को ढूंढने सब एक होकर जुट गये। हर कोई अपने-अपने संबंधों और शक्तियों का प्रयोग सिर्फ एक दिशा में कर रहा था। यूं तो पुलिस में एफआईआर दर्ज थी...और प्रशासन अपना यथायोग्य काम कर रहा था...पर इन शास्त्रियों की फौज प्रशासनिक कार्रवाईयों की आड़ में कहां हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाली थी..और बरबस ही इनमें से ही कोई जेम्स बांड बन गया था, कोई सीआईडी का एसीपी प्रदुम्न और कोई डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी। गोया कि कई तो यूं ही सबूतों के शिगूफे उड़ा दिया करते थे...पर इस शिगुफाई में दोष उनका भी न थो कोई...क्योंकि जो कदाचित् किन्हीं कारणों से कुछ नहीं कर पा रहे थे उन्हें कुछ न करने की टीस सालती थी और बस यही अपराधबोध उन्हें सशंक सूचना देने के लिये प्रेरित करता था। 

मैं नहीं कहता...कि इन प्रयासों ने हमारे गुम हुए शास्त्री भाई को वापस ढूंढ के दिखाया...लेकिन इन प्रयासों में छुपी हुई दिली तमन्नाओं ने ज़रूर इस काम को किया है। ये कुछेक अवसर देखने में बेहद छोटे होते हैं...किंतु ये उस परिवेश का स्वर्णिम इतिहास होते हैं। ये घटना कतई उन आंदोलनों से कमतर नहीं...जब सारा देश दिल्ली की किसी निर्भया के लिये एक हुआ था..जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के आंदोलन में देश जुड़ गया था...या बर्बर अंग्रेजी सल्तनत ने रियासतों में बिखरे हिन्दुस्तान को एक किया था। यकीनन इस घटना की फ्रिक्वेंसी उन घटनाओं के सामने कुछ भी नहीं...लेकिन एक होने की वजहें और उनका भाव समान ही है। तब भी किसी एक पर आई विपदा सबकी जान पड़ती थी और अब भी हमें किसी एक पर आई विपदा हम सबकी जान पड़ी....और वो कहते हैं न कि सहूलियतें जुदा करती हैं लेकिन विषमताएं मिलाती हैं...विपत्ति की इस घड़ी में सब बिना किसी पूर्व नियोजित प्रस्ताव के मिल गये। खामख्वांह जाग उठा सब में "संघे शक्ति" का भाव।

बहरहाल, तमाम घटना को बयां करना यहां प्रयोजनीय नहीं है...क्योंकि इस घटना में मौजूद सूचनाओं और जानकारियों में इसका सार नहीं है। घटना का सारांश है हम सबके ज़ेहन में मौजूद एकता का भाव। घटना का सारांश है किसी एक पर आई विपत्ति पर सबका खड़ा हो जाना। घटना का सारांश है हमारे प्रेम के कारण बनी सुरक्षा की भावना। कमाल का संयोग है...है कि टोडरमल स्मारक जिस साल को अपने स्वर्णजयंती वर्ष के रूप में मना रहा है उसी साल में घटी एक नितांत छोटी घटना ने हमें मिला दिया...और इसके लिये किसी तरह का कोई औपचारिक आयोजन भी नहीं करना पड़ा। 

बस गुज़ारिश यही है कि इस एक्य को यूंही बनाये रखें। अपनी अंध तरक्की में यूं न खो जायें कि हमसे हमारी ही जड़ें कट जायें। एक-दूसरे की उन्नत्ति पर प्रसन्न हों, एकदूसरे के दुख में सहभागी बने। यकीन मानिये यदि हम सब हैं..तो ही कुछ हैं। अकेले होकर तथाकथित सफलता के शिखर पर भी क्युं न बैठ जायें पर अकेले हैं तो कुछ भी नहीं। नितांत स्वार्थी वृत्तियां और व्यवहार इस दुनिया का सच हो सकता है....पर हम शास्त्रियों का कतई नहीं।