हमारा स्मारक : एक परिचय

श्री टोडरमल जैन सिद्धांत महाविद्यालय जैन धर्म के महान पंडित टोडरमल जी की स्मृति में संचालित एक प्रसिद्द जैन महाविद्यालय है। जिसकी स्थापना वर्ष-१९७७ में गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की प्रेरणा और सेठ पूरनचंदजी के अथक प्रयासों से राजस्थान की राजधानी एवं टोडरमल जी की कर्मस्थली जयपुर में हुई थी। अब तक यहाँ से 36 बैच (लगभग 850 विद्यार्थी) अध्ययन करके निकल चुके हैं। यहाँ जैनदर्शन के अध्यापन के साथ-साथ स्नातक पर्यंत लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था है। आज हमारा ये विद्यालय देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। हमारे स्मारक के विद्यार्थी आज बड़े-बड़े शासकीय एवं गैर-शासकीय पदों पर विराजमान हैं...और वहां रहकर भी तत्वप्रचार के कार्य में निरंतर संलग्न हैं। विशेष जानकारी के लिए एक बार अवश्य टोडरमल स्मारक का दौरा करें। हमारा पता- पंडित टोडरमल स्मारक भवन, a-4 बापूनगर, जयपुर (राज.) 302015

Sunday, July 28, 2013

Pinkish Days In Pinkcity : Part - I

(ये हमसब का व्यक्तिगत विवरण है..यूं तो इसकी टारगेट ऑडियंस सिर्फ हमारी क्लॉस के ही चुनिंदा शख्स हैं क्योंकि उन्हें ही मैं विशदता से जानता हूं और उनसे जुड़ी यादों को ही शेयर कर सकता हूँ फिर भी, कुछ और लोग भी इस संस्मरण से खुद को जुड़ा पा सकते हैं ये आपके area of interest पे निर्भर करता है।)
2002। यही वो वर्ष था जब अलग-अलग नगरों-गाँवों और भांत-भांत के प्रदेशों से कुछ मासूम, नटखट, स्मार्ट तो कुछ उबड़-खाबड़ सी शक्लों वाले नादान परिंदों के जयपुर के इस घरोंदे में इकट्ठे होने की दास्तां शुरू हो रही थी। हमें बताया गया कि ये इस बगिया का 26 वां गुलिश्ता है, जी हां बैच नं 26। एक गौरवशाली परंपरा में अब हमारे नाम भी चस्पा होने जा रहे थे। यूं तो कुछ खास नहीं था हममें..पर कुछ भी बिल्कुल खास न हो ऐसा भी नहीं था...वक्त की रेत पे अपने निशान छोड़ने की कुव्वत थी हममें..भले ही कुछ देर को ही सही। तो इस तरह हमारा कारवाँ जुड़ रहा था..हम बढ़ रहे थे और साथ ही पल रहा था उम्मीदों का भ्रूण हम सबके ज़हन में, जो कुछ कर दिखाना चाहता था..छा जाना चाहता था...लेकिन फिलहाल हम सिर्फ जीना चाहते थे इन लम्हों को..क्योंकि जिंदगी के सफर में हर चाहा हुआ पड़ाव तो आके मिलेगा ही पर ये गुजरे हुए लम्हें फिर लौट के आने वाले नहीं है..बस इसलिये हम इन्हें जी लेना चाहते थे।

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परिंदे थे जो इस एक डाल पे झूल रहे थे पर इनमें से तीन परिंदे कुछ वक्त बाद ही उड़ गये..अपने-अपने वतन को। क्योंकि उन्हें रास नहीं आ रहा था ये बदला हुआ परिवेश, यहाँ की आबो-हवा में व्याप्त एक सौंधी सी रुमानियत, जो शुरुआत में थोड़ी कसायली-सी लगती है। वे तीन चले गये थे पर अब भी वे हमारी यादों में बसर करते हैं और होती हैं उनसे हमारी मुलाकातें अक्सर ख्वाबों में या इस फेसबुक के संजाल पे। जी हाँ, विवेक रन्नौद, अभिषेक इन्दार, प्रवीण इन्दार। यही नाम थे इनके..थे मतलब अभी हैं पर इस सफर में वे आगे नहीं आये।

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अगस्त 2002 को मैं, संभवतः वो आखिरी शख्स था जिसने इस पहले से भरी हुई डाल पे अपना डेरा जमाया था। बड़ी मशक्कत के बाद मैं ठहरा रह सका, हमारे इस कारवाँ का हमसफर बना रह पाया..जिसमें कुछ लोगों का योगदान में कभी भी नहीं भूल सकता..उनका ज़िक्र में आगे करूँगा। पर अभी ज़रा इन परिंदों का परिचय पाले..हालांकि इनको शब्दों में समेटना मुमकिन नहीं है पर फिर भी अपनी उपयुक्त क्षमता और शब्दों की मर्यादा में रहते हुए इस प्रयास को करना ज़रूर चाहुंगा। जब इनके बारे में कुछ कहूँगा तो कथन में एक क्रम तो आएगा पर मेरी नज़र में ऐसा कोई क्रम नहीं है...और वे सब मेरे प्रमाण का विषय हैं, नय का नहीं। इसलिये एक अनएक्सपेक्टेड शख्स से ही शुरुआत करता हूँ, जो बेचारा इस फेसबुक के सायबर संजाल से कोसों दूर बैठा, जबेरा में सांसे ले रहा है...

सचिन इसकी आँख के किनोर पे किसी करेंट के मारे चस्पा हुआ एक निशान हमेशा एक अहम् चर्चा का विषय रहा..और शुरुआत में कुछ मासूम से पंछी इन्हें देख डर भी जाया करते थे। इनका एक वाक्य बड़ा पापुलर हुआ करता था "हैरान ने करो, यार"। दादा के संबोधन से संबोधित ये शख्स, अपने उपदेशप्रियता के लिये जाने जाते थे..कहने को बहुत कुछ है इनके बारे में पर आगे बात करेंगे..

सोनल 'ने कर यार, बडे भाई'। बड़े भाई के तकियाकलाम से अपनी खास छाप जमाने वाले सोनल..अपनी गज़ब की संवादअदायगी के लिये हमारे दिलों में आज भी हैं...देखन में छोटे लगे पर घाव करें गंभीर...बटलर, के खास संबोधन से इनका इस्तकवाल किया जाता था।

सन्मति'अरे नी यार' किसी भी बात को सुन महाशय की ये प्रतिक्रिया, बात की अहमियत को फिजूल में ही बढ़ा देती थी। शाही अंदाज, चाय के शौकीन और साथ ही दीर्घशंका भी इनका अहम् शगल हुआ करता था। कुछ दो-चार चले-चपाटों को अपने साथ ले जाके चाय पिलाके ये खुद की शाहीगिरि दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।

विवेक। रविजी और पिड़ावा के दो अनमोल रतन, एक की बात तो हम ऊपर कर चुके हैं दूसरे अनमोल रतन यही हैं। हम्म्म्म्म हेरलेएएएए....कहके ये महाशय विंग में घूमा करते थे...और भांत-भांत के चिड़िया-कौव्वों की आवाजें निकालकर ये ज़ाया करते रहते थे कि एक अच्छा-खासा चिड़ियाघर इनमें बसता है..'काईं वैंडो हो रियो है' कहके अपने ख़ालिश पिड़ावा वाले होने का परिचय दिया करते थे..इनकी दास्तां बहुत है, आगे बात करेंगे।

किशोर। झूम बराबर झूम शराबी..एक लाजबाव शख्सियत। 'ये क्या कोई उठाने की पद्धति है" ये वाला संवाद इन्होंने शायद वरिष्ठउपाध्याय में बोला था पर इसे बोलने की अदा कुछ ऐसी थी कि ये उनका सिग्नेचर शॉट बन गया था। इनकी बनाई गई क्रिकेट टीम सबसे ज्यादा पॉपुलर क्रिकेट टीम थी और प्रवचन के बीच भी अगले दिन के क्रिकेट के लिये किशोर भाई की रणनीतियां बना करती थी।

सतीश। एक गुमनाम सी रहने वाली शख्सियत। बहुत ज्यादा ग्लैमर से दूर ये अपने काम से काम रखा करते थे..मैं खुद इन्हें समझने के जतन में लगा रहा पर समझ नहीं पाया...क्योंकि ये अपने व्यक्तित्व के पट इस क़दर बंद रखा करते थे कि कोई चुपके से भी उसमें नहीं घुस पाता था।

निखिल...निपुण..राहुल...रोहन...जीतू...अंकित..अरहंत..अभय...अनु और भी बहुत से पन्ने हैं जिन्हें पलटना है पर अभी के लिये इतना ही...थोड़ा इंतजार कीजिये, वैसे आप सभी इनके बारे में जानते हैं पर फिर से रीकॉल करने का मजा ही कुछ और है......

जारी...............

 

Pinkish Days In Pinkcity

अनायास ही कुछ अतीत की यादें गलबाहियां कर रही हैं...और मैं अपने मौजूदा दौर से निकल के बहुत पीछे उन दिनों में जा रहा हूँ..जहाँ बेफिक्री का आलम हुआ करता था..मेरे दोस्त थे, गुलाबी नगर था और थी कुछ छोटी-मोटी नोंक-झोंक...और यकीन मानों वे नादानियों की नोंक-झोंक आज के इस समझदारी पूर्ण जीवन के तनावों से कई बेहतर थी और कई खुशनुमा भी...पीटीएसटी बैच नं 26 तुम सबकी बहुत याद आ रही है यार..यही वजह है कि कुछ और काम में दिल नही लग पा रहा है..इसलिये चाहता हूँ कि अपने शब्दों और धुंधली पड़ चुकी यादों के ज़रिये उन लम्हों में घूम के आया जाय...दोस्तों अपने इस ग्रुप में लफ्जों के जरिये उन्हीं लम्हों की सैर पे निकल रहा हूँ..आप सबभी जुड़ते जाये, कारवाँ बनता चला जायेगा....
(ये हमसब का व्यक्तिगत विवरण है..यूं तो इसकी टारगेट ऑडियंस सिर्फ हमारी क्लॉस के ही चुनिंदा शख्स हैं क्योंकि उन्हें ही मैं विशदता से जानता हूं और उनसे जुड़ी यादों को ही शेयर कर सकता हूँ फिर भी, कुछ और लोग भी इस संस्मरण से खुद को जुड़ा पा सकते हैं ये आपके area of interest पे निर्भर करता है।)

तो पेश है Pinkish Days in Pink-city की खास पेशकश-
जारी..........

Tuesday, June 25, 2013

साधक पे नहीं संस्कृति पर हमला....

सदियों से भारत भूमि की पहचान यदि किसी से है तो वह है यहां का अध्यात्म और ज्ञान की सतत् खोज। यही हमारी संस्कृति रही है और यही हमारे जीवन का मूल लक्ष्य। भौतिक विकास और असीम आकांक्षाओं वाले इस युग में भले आधुनिक जीवन शैली का उन्माद लोगों पर नज़र आये पर आज भी कुछ साधक है जो उसी दिव्यता की यात्रा पर निरंतर गतिमान है। जिस भौतिकता की चकाचौंध पर आज पश्चिम इतरा रहा है ये भौतिकवाद अजब-गजब भारत का उद्देश्य कभी नहीं रहा। वैभव का असीम इतिहास हिन्दुस्तान ने देखा है पर इस भौतिक वैभव से परे यहां के बुद्धिजीवी वर्ग की लालसा कुछ और ही रही है।

      भौतिक उन्माद के इस मरुस्थल में आत्मसाधना के कुछ शीतल कूपों को संजोये हुये और हमारी संस्कृति को जीवित रखे आत्मसाधक मनुज न सिर्फ अपनी चैतन्य वाटिका में खुद शीतलता का आस्वादन कर रहे हैं अपितु अपने निकट के समस्त वायुमण्डल में भी शीतल हिलोरें प्रवाहित कर रहे हैं। किंतु इस कलिकाल में विषयाग्नि में निरंतर दहन को प्राप्त हो रहे कुछ विधर्मियों को न तो वो शीतल वायुमण्डल रास आता है और न ही शीतलता का आस्वादन करते वे साधक। 

      जी हां हम बात कर रहे हैं पिछले दिनों जैन मुनि व साध्वी पर हुए दुर्दांत हमलों की। अपने चैतन्य सरोवर में निमग्न रहने वाले व समस्त विश्व पर ज्ञान व करुणा की वर्षा करने वाले इन साधकों का भला किसी से क्या बैर होगा, जो अपनी अमानुष प्रवृत्तियों का शिकार कुछ शैतानियत के प्रतिनिधि इन साधकों को बनाते हैं। भोग-संयोग से दूर किसी पारलौकिक पदार्थ की खोज में निकले ये साधक संसार की समस्त माया व मोह से दूर है और जहाँ मोह-माया के ये कंटक ही नहीं है तो वहां किसी के क्रोध या द्वेष का शिकार इन्हें कैसे बनाया जा सकता है। लेकिन मनचलों की हठधर्मिता और क्षोभ की पराकाष्ठा वाले इस दौर में कुछ भी हो सकता है जहाँ समूह में दुर्दांत पाप को तो अंजाम दिया जा सकता है पर एकांत में ज्ञान-आराधन नहीं किया जा सकता।

      शिकायत, इन तत्वज्ञान से शून्य और अविवेकी-कषायी जीवों से नहीं है शिकायत है समाज और सरकार से। जहां हम एक ऐसा सुरक्षिम वातावरण इन साधकों को मुहैया नहीं करा पा रहे, जिसमें ये अपनी साधना के पथ पर निर्बाध बढ़ सकें। कोई इन घटनाओं को भी इन साधकों के ऊपर उपसर्ग बताते हुए ये कहकर पल्ला झाड़ सकता है कि ऐसा तो हर काल में होता है। निश्चित ही ये उन साधकों के लिए तो उपसर्ग ही है किंतु ये संपूर्ण मानव समाज के लिए है सिर्फ एक कलंक। प्राचीन काल में जब ऐसे विधर्मी और मोहाविष्ट जीवों के द्वारा साधकों पर उपसर्ग होता था तो इन साधकों के उपसर्ग निवारण के लिए तथा उन्हें एक उत्तम परिक्षेत्र उपलब्ध कराने वाले जीव भी हुआ करते थे। लेकिन आज के समय में समाज की ये उदासीनता और अपने विषयासक्त कार्यों में ही व्यस्तता स्वयं को ही मूंह चिढ़ाने का काम कर रही है।

      इस देश की संस्कृति संतों से है और उन्हीं से भविष्य में प्रवाहित होगा हमारा ज्ञान-विज्ञान और दर्शन। हमनें कभी भी संग्रह का सम्मान नहीं किया, यहाँ सिर्फ त्याग का ही आदर हुआ है। न सिर्फ जैन-दर्शन में बल्कि अन्य जैनेतर भारतीय दर्शनों में भी त्याग, समर्पण, अहिंसा और सत्य को ही समस्त लौकिक कार्यों व उपलब्धियों से श्रेयस्कर बताया गया है। त्याग, समर्पण, अहिंसा और सत्य के इन सिद्धांतों को सुदृढ़ करने वाले प्रावधान हमने संविधान में शामिल किये। इन समस्त प्रावधानों और सिद्धांतों को भले हम पूजें और इन सिद्धांतों के धारक व्यक्तित्व की जय-जयकार करें पर असल में इन सिद्धांतों को इस पृथ्वी पर साकार करते हैं हमारे साधक। अगर ऐसे में हमारे इन साधकों को ही हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ेगा तो फिर कौन हमारी संस्कृति को जीवंतता प्रदान करेगा। हम हमारे संविधान की प्रस्तावना में बड़े उत्साह से विचार, अभिव्यक्ति, धर्म, उपासना की स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं और उतनी ही परिपक्वता और उम्मीद के साथ सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय देने की बात करते हैं पर कहाँ है ये स्वतंत्रता और कहाँ है ऐसा न्याय।

      अगर हममें इतनी क्षमता नहीं है कि हम हमारे विषय-पोषण और लौकिक क्रियाकलापों से विराम पाकर अध्यात्म और मोक्ष के पथ पर आगे बढ़ सकें तो कम से कम एक श्रावक होने के नाते, समाज का एक हिस्सा होने के नाते ये तो हमारा कर्तव्य बनता ही है कि इन आत्मसाधकों की रक्षा के पुख्ता इंतजाम उपलब्ध करा सकें। इन साधकों के साधनापथ में ज़रूरी बुनियादी आवश्यकताओं का ध्यान रख सकें।आज भले हमसे ये कहा जाय कि हम संख्या में बहुत थोड़े हैं हमारी कौन सुनेगा पर अगर हम संगठित हैं तो हमारी शक्ति का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। संस्कृति पे हुए इस हमले को हम दिगम्बर, श्वेताम्बर, बीसपंथी, तेरापंथी, स्थानकवासी के भेद से नहीं देख सकते; इसे तो जैन बनकर, महावीर के अनुयायी बनकर देखना होगा क्योंकि तभी हमारी गर्दन शर्म से झुक सकती है और हममें इस दिशा में कुछ करने की संकल्पशक्ति जाग्रत हो सकती है।
 
      बेशक हम अहिंसावादी हैं और हम रहेंगे भी। फिजूल का उन्माद खड़ा करना न तो हमारा उद्देश्य है और न ही हमारा आदर्श। लेकिन संस्कृति पर हुए इस हमले के विरुद्ध यदि हमारे स्वर भी मुखर नहीं होते तो ये अहिंसा नहीं, नपुंसकता है। सुप्त प्रशासन को नींद से जगाने के लिए आवाजें तो निकालना ही पड़ेंगी, गर ये आवाजें एकजुट हैं तो निश्चित ही इनका शोर बड़ा प्रभावी होगा। जो कोई भी जहां भी, जिस भी जगह है उसे अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर इस दिशा में विरोध प्रदर्शित करना ज़रूरी है। इन साधकों को एक आदर्श माहौल देने के लिये जिस किसी भी प्रकार से हम अपना योगदान दे सकें वो प्रशंसनीय ही है। इन सारे कृत्यों में हम अहिंसक ही रहेंगे और अहिंसा के सहारे ही अपना विरोध प्रदर्शित करेंगे और यकीन मानिये कि अगर एक उच्च आदर्श और बेहतर उद्देश्य के साथ हमारे ये अहिंसात्मक प्रयास संपन्न होते हैं तो ये किसी भी तरह के अन्य प्रयासों से ज्यादा असरकारक साबित होंगे।

      ये आत्ममंथन की घड़ी है जहाँ हमें ये विचारना है कि हमारा भविष्य कैसा होगा और कैसी होगी हमारी संस्कृति। क्या हालातों से समझौता करते हुए हम जिंदा रहना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो इस समझौते में हम, हम रहेंगे ही नहीं। जो भी बचेगा वो कोई और ही होगा। क्या खुद को किसी और में मिलाकर हम जिंदा रहना चाहते हैं? तो इस परिस्थिति में भी अपनी मौलिकता खो देने पर हम मरे हुए की ही तरह है। हम हमारी अक्षुण्ण परंपरा को बनाये रखकर ही जीवित रह सकते हैं और हमारी परंपरा की अक्षुण्णता इन साधकों से है। इन साधकों से ही हैं हमारे घरों में संस्कार, इनसे ही है जैनत्व की पहचान और इनसे ही है संस्कृति की जीवंतता। हमारी अवधारणा तो सदा से यही है कि सिद्धांतों से समझौता नहीं और व्यवहार में विरोध नहीं लेकिन यदि हमें हमारे सिद्धांतों से समझौता करने पर मजबूर किया जाता है तो व्यवहार में विरोध भी मुखर होगा ही होगा।

      जगत में अन्याय, अनीति, व्यभिचार का समुद्र लहलहा रहा है ये समुद्र निरंतर किनारों से अपना माथा कूटकर अपनी मर्यादा को लांघ जाना चाहता है पर संत-महात्माओं से मिले सत्चरित्रता के संस्कार, वो अग्नि है जो इस सागर को अपनी सीमा को लांघने की इज़ाजत नहीं देती। अगर वो अग्नि ही बुझ गई तो निश्चित ही ये सागर अपनी सीमाओं को तोड़कर भयंकर तबाही लाकर रहेगा......

Sunday, March 17, 2013

जज्बातों के लिबास बनने की मुश्किल कोशिश करते अल्फ़ाज......


एक हिन्दी फिल्म का प्रसिद्ध गीत 'जो भी मैं कहना चाहुं, बरबाद करें अल्फाज मेरे' इंसान की अभिव्यक्ति की जबरदस्त लाचारी को बयां करने वाला गीत था। शब्द बृम्ह कहलाते हैं और इनके सहारे ही इंसान सभ्यता और विकास की नित नई इबारत लिख रहा है। रीति, रस्म, रिवाज, संस्कार का प्रसार इन्हीं अल्फाजों के सहारे हो रहा है...लेकिन इतना कुछ कह जाने के बाद भी बहुत कुछ अनकहा ही रह जाता है। या तो चीजें बयां नहीं हो पाती और गर बयां होती हैं तो समझी नहीं जाती। वार्ताओं का मंथन अमृत कम, ज़हर ज्यादा उगल रहा है और खामोशियों की वाचाल जुवां सुनने की कोई जहमत ही नहीं उठा रहा है।
असीम कुंठा, असीम दर्द, पीड़ा, मोहब्बत या नफरत से कभी गोली निकलती है, कभी गाली, कभी आंसु तो कभी कविता...पर अनुभूतियों का कतरा भी अभिव्यक्त नहीं होता। इंसान बेचैनियों का बवंडर दिल में दबाये जिये जाता है क्योंकि दुनिया में वो किनारे ही नहीं हैं जिस दर पे जज्बातों की लहरें अपना माथा कूटे। बेचैनियों की आग हर दिल में धधक रही है पर धुआं ही नहीं उठ रहा..जिसे देख लोग उस आग का अनुमान लगा सके। धुआं उठ भी जाये तो वो लोगों की आंखों में धंस जाता है जिसके बाद लोग उस आग को देखने की हसरत ही त्याग देते हैं क्योंकि जो भी मैं कहना चाहूं, बरबाद करें अल्फाज मेरे। इंसान अनभिव्यक्त ही रह जाता है।
जिंदगी के सफर में रिश्तों की सड़क साथ चलने का आभास देती है पर हम आगे बढ़ते जाते हैं और सड़क का हर हिस्सा अपनी जगह ही स्थिर रहता है। हम अकेले ही होते हैं..हमेशा, हर जगह। कुछ पड़ावों पर हमें हमारा साया नजर आता है जो हम सा ही प्रतीत होता है..पर वो बस प्रतीत ही होता है क्योंकि हम जैसा और कोई नहीं होता। हमारे दिल में वो परछाईयां जगह पाने लगती हैं जो हम सी नजर आती है...हमको समझती हुई सी दिखती है पर अचानक हमारा दिवास्वपन टूटता है और हम फिर बिखर जाते हैं...बिना अभिव्यक्त हुए। कभी मुस्काने बिखरती हैं तो कभी आंसू..और कभी कुछ बेहुदा से अल्फाज भी...पर सब झूठे ही रहते हैं। याद आता है वो गीत- 'कसमें-वादे, प्यार-वफा सब बातें हैं बातों का क्या.......
इस सूचना विस्फोट के युग में कितना कुछ बाहर आ रहा है...सोशल नेटवर्किंग साइट्स, टेलीविजन, फिल्म, साहित्य सब जगह कितना कुछ अभिव्यक्त हो रहा है...पर क्या वाकई अनुभूतियां मुखर हो पा रही हैं। भ्रम के इस युग में अल्फाज सबसे बड़े भ्रम हैं। जो बातें हैं वो जज्बात नहीं है...वो जज्बात हो ही नहीं सकते क्योंकि जज्बात नग्न ही होते हैं और अदृश्य भी...ये लफ्जों के लिबास उन्हें ढंक सकते हैं प्रगट नहीं कर सकते। पूरा जीवन उस एक शख्स और उन चंद अल्फाजों को खोजने में लग जाता है जहां जज्बातों को पनाह मिल सके।
तपन से वर्फ पिघल सकती है, लोहा पिघल सकता है, पर्वत, पाषाण और  संपूर्ण पर्यावरण पिघल सकता है...पर रूह की इस भीषण गर्मी से इंसान नहीं पिघल रहा। उसके सीने में मौजूद जज्बातों के विशाल सरोवर पर बना दायरों का बांध, अल्फाजों की लहरों को निकलकर आने ही नहीं दे रहा..और जो बाहर आ रहा है वो बहुत ही सतही और दूषित लहरें हैं जिन्हें पवित्र बनाने के झूठे जतन किये जा रहे हैं। बहरहाल, अपने इस असमर्थ लेख के गरीब अल्फाजों से कुछ कहने की अनकही कोशिश कर रहा हूं...पर इन गरीब अल्फाजों ने उन संसाधनों को आज तक विकसित नहीं किया जिससे ये कुछ कह पायें...खैर, मैनें कहने की मुश्किल कोशिश की है आप समझने के दुर्लभ जतन करना.............